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हिंदुस्तानी मुसलमान अरब के गुलाम





भारत, पाकिस्तान बंग्लादेश के मुसलमान अरब के गुलाम है

मोहम्मद साहब के नकली वंशज और अरब के गुलाम हैं पाकिस्तानी मुसलमान





arab prince
डिजि प्रयुक्ति @ नई दिल्ली
सऊदी अरब के रक्षा मंत्री और प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान को अरब का गुलाम बताकर अंतरराष्ट्रीय जगत में उसे हंसी का पात्र बना दिया है। विवाद कतर और सऊदी अरब विवाद के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता को लेकर उठा है। प्रिंस सलमान ने कहा कि पाकिस्तान अबर का गुलाम है और पाकिस्तानी सही मायनों में मोहम्मद साहब के असली वंशज नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस्लामी देश नहीं है और पाकिस्तान व बांग्लादेश के लोग मुस्लिम नहीं हैं।
सऊदी प्रिंस ने कहा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग वह हैं जिन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर मुस्लिम धर्म अपनाया है। लिहजा वह मुसलमान नहीं हैं। प्रिंस सलमान पाक और बांग्लादेश के मुसलमानों को हिंदी-मुस्कीन कहते हैं। जिसका मतलब दोयम दर्जे के मुस्लिम है। यही कारण है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों को सऊदी अरब में किसी बड़ी पोस्ट पर नहीं रखा जाता। इससे पहले भी अमेरिका-सऊदी बिजनेस सम्मेलन के दौरा डोनाल्ड ट्रम्प के सामने पाकिस्तान को बोलने का मौका नहीं दिया गया था।

काल्पनिक दोहरी शाशन व्यवस्था जिसका सच्चाई से कोई मतलब नहीं

एक दोहरी शाशन व्यवस्था की कल्पना करते है |

मस्जिद में म्युजिन =>मुजाहिद=>इमाम =>इमाम इ मुबेन =>ग्रैंड इमाम =>मुफ़्ती =>ग्रैंड मुफ़्ती=> सऊदी अरब कानून मंत्रालय =>सऊदी किंग

ये राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, ये हिंदुस्तानी अपने को नहीं मानते है | देश के कानून कोर्ट PM CM को नहीं मानते है |

अब आप इनका समकक्ष पद देखे और मक्कारी पर नजर डाले |

म्युजिन =मुखिया के बराबर ( सुबह सुबह बांग देने वाला  )

मुजाहिद = प्रखंड अध्यक्ष

इमाम = कलक्टरइमाम 

इ मुबेन = उपमुख्यमंत्री

ग्रैंड इमाम (शाही इमाम) = मुख्यमत्री

मुफ़्ती =प्रधानमंत्री (भारत पाकिस्तान बंग्लादेश अफगानिस्तान अफ्रीका इत्यादि देशों के प्रधानमंत्री के समकक्ष )

ग्रैंड इमाम = पूरा विश्व का लेखपालसऊदी अरब कानून मंत्रालय इसका कानून बनाता है

सिर्फ मुफ़्ती को मानते है| मुफ़्ती अरब में बैठे हुए ग्रैंड मुफ़्ती को मानते है | ग्रैंड मुफ़्ती सऊदी अरब के कानून मत्रालय के आदेश पर चलते है | कानून मंत्रालय मानवाधिकार वाले यानि इल्लुमिनाति वाले चलाते है| जब चाहे वैसा कानून लिखवा देते है |

अब सुनते है सऊदी अरब के रक्षा मंत्री और प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को जो कहते है "भारत, पाकिस्तान बंग्लादेश के मुसलमान कनवर्टेड हिन्दू 'अल हिंदी-मुस्‍कीन' अरब के गुलाम है"अब तो मान जाय हम भी सोचने लगे है | जग गए है | ये सपना नहीं है जिसे मैंने देखा |मै इसबात से इंकार करता हूँ पाकिस्तान जिन्ना ने बनाया था | ये कल्पना है कोई सच्चाई नहीं है |




PAKISTANIS ARE OUR SLAVES SAYS THIS SAUDI MINISTER


Saudi Arabia has always believed that it was the true land of Islam. While they consider other Muslim nations inferior, they also claim that they are the direct descendants of Muhammad. The prince of Saudi Muhammad Bin Salman has made a controversial statement humiliating Pakistan.
Muhammad Bin Suleiman believes that Pakisanis are the slaves of the Arabs. Suleiman is also the Defence Minister of Saudi Arabia. This statement proves that Saudi looks at every other Muslim country with the ‘converted-muslim’ country perspective. Muslims from India, Pakistan & Bangladesh are called ‘Hindu-muslims’ in Saudi.
They consider the Muslims from these 3 nations to have converted to Islam from Hinduism. The Indian, Pakistani & Bangaldesh Muslims are also called as “Al-Hindi-Muskeen” referring to them as second-grade Muslims. The differentiation in the system is an open fact. Arabi Muslims are preferred to “Hindu Muslims”, be it any job or top post.
The top posts are always reserved for the Saudi Arabians. The other Muslim nations and their citizens are considered to be inferior. Hence they are given inferior or insignificant posts in their army. Even Indian Muslims are a subject to this bias.
A Pakistani Journalist posted this letter, wherein the Saudi Defence Minister was referring to Pakistanis as slaves.
Tanveer Arain is a renowned Pakistani journalist who works for Pakistan’s English newspaper Dawn. In this Twitter post Tanveer Arain has quoted Saudi’s Defense Minister referring to Pakistan as a slave country. The Defence Minsiter called Pakistan a slave country that will continue to remain a slave of Saudi Arabia forever.
We must tell you that prior to the Suleiman kings, the Abdullah kings reigned in Saudi. But, the outlook was the same. The Abdullah Kings had said that “Indian & Pakistani Muslims grow beards to look good like us, but they look like they’ve come straight from the forest.”

कश्मीरी पंडितों और अब्दाली

अब बात करूँगा कश्मीरी पंडितों और अब्दाली को लेकर मिलने वाले तानो से | गुरु के पास कुछ मुट्ठी भर कश्मीरी पंडित गए जरुर थे , उसका कारण था की टेग बहादुर अपना राज्य बचाने के लिए वैसे ही मुगलों से लड़ रहा था , इसलिए वो उनके पास गए की कश्मीरी और पहाड़ी राजाओं के साथ मिल कर लडो | पर इस चीज़ को हिंदुओं को डरपोक दिखाने के लिए और ही रूप दे दिया गया | अब्दाली की बात करने वाले यह नहीं बताएंगे की दुनिया के दस देशों में हिंदू उस समय सबसे बड़ा धर्म था , भारत तिब्बत से लेकर काबुल तक फैला था , बर्मा पाकिस्तान हमारे भूभाग थे , एक अदने से राज्य में लड़कर क्या इतनी बड़ी दुनिया जहाँ नेपाल, इंडोनेसिया, बाली जैसे हिंदू देश भी शामिल थे , क्या इतनी छोटे से भूभाग पर लड़ लेने से ही हिंदू धर्म बच गया ??? शिवाजी , राणाप्रताप , पेशवा क्या घास छिलते हुए जीवन व्यतीत कर गए | खुद गोबिंद सिंह की रक्षा की थी शिवाजी ने उन्हें नांदेड में छिपा कर | यह बात क्यूँ भूल जाते हैं सिख की मुगलों के पाँव मराठों और पेशवा ने उखाड़े थे , सिख एक भी जंग नहीं जीत पाए थे कभी | तो कैसे हिंदुत्व की रक्षा की , कोई समझा दे |
ऐसे ही सिखों के लिए शहीदी देने वाले मति दास , सती दास जिन्हें मुगलों ने जिंदा जला दिया क्यूंकि वो सिख धर्म की रक्षा के लिए तत्पर थे , ब्राह्मण थे | अजय शर्मा एक ब्राह्मण ,जिन्होंने सिख गुरु की रक्षा करते हुए मैदान – ए – जंग में मात्र पन्द्रह साल की उम्र में शहीदी ली | ऐसे ही गुरु के पांच प्यारों में एक नाम ब्राहमण का भी था | रंजीत सिंह की फ़ौज में लाहोर के ब्राह्मणों की एक अलग टुकड़ी थी , रणजीत सिंह के साथ जब झंडा सिंह और गंडा सिंह ने गद्दारी की और अंग्रेजों से हाथ मिला लिया तब इन्ही ब्राहमणों ने उसकी मदद की और उसका राज्य बचा कर दिया | काहे के शेर ?? सच यह है की रंजीत सिंह ने हमेशा अंग्रेजों से अपनी बेटियों की शादी करवा कर अपने राज्य की रक्षा की और एक गुलाम राजा की तरह रहता रहा | राजपूतों को गालियाँ देने वाले सिख याद रखें की महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों ने मौत को गले लगा लिया पर अपनी बहने नहीं सौंपी | आर्य अपनी रक्षा खुद करते आये हैं , जब सिख नहीं थे तब भी हम लड़ते थे , हम चार हज़ार सालों से शत्रुओं से लड़ रहे हैं और डटे हुए हैं | वैसे भी सिख उपर से नहीं टपके , कुछ ऐसे लोग जिनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी , अपने माँ बाप के धर्म को त्याग आकर सिर्फ ब्राह्मणों से नफरत के आधार पर इस विचारधारा में कूद पड़े | आज भी अमृतसर केप्टन कालिया जैसे शूरवीर ब्राह्मण पैदा कर रहे है और करता रहेगा | आज बंदा बहादुर , सती दास, मतिदास जैसे ब्राह्मणों के कारण ही सिख धर्म है , सिर्फ गानों में किराए के हथियार दिखा लेने से , फुकरी मारने से शेर नहीं बनते बेटा | याद रखना हिंदुओं की तलवार बड़ी भारी होती है , शिवाजी की तलवार तुम जैसे आठ लोग मिलकर उठाते थे | जय श्रीराम |

राजा भीमचाँद जी और गुरु तेग बहादुर जी


गुरु तेग बहादुर जी का असली नाम त्याग मल सोढ़ी था l इन्हें हिमाचल प्रदेश के बिलास पुर के राजा ने अपने यहाँ आश्रय दिया था क्यूंकि उस समय सिख पन्थ इन्हें अपना गुरु मानने को र्तैयार नही थे, अकाल तख़्त ने भी अमृतसर आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, ऐसा sikhiwiki.net पर ही पढ़ सकते हैं l बिलास पुर के राजा ने जो गाँव रहने को दिया था उस का नाम रखा गया चक-नानके, जिसको कि बाद में आनंदपुर साहिब का नाम दिया गया l यह बात भी इतिहास में दर्ज है कि इसी बिलासपुर के राजा की मृत्यु के बाद जो अगले राजा बने उनके पुत्र राजा भीमचंद, उन्ही के विरुद्ध गुरु गोविन्द सिंह ने तलवार उठाई थी जो कि आप Battle of Bhangani के नाम से सर्च करके पढ़ सकते हैं l
राजा भीमचाँद जी के पास कुछ हिन्दू गए थे शिकायत करने कि गुरु गोविन्द सिंह हिन्दुओं को धर्मान्तरित कर रहे हैं, हिन्दू देवी देवताओं के विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणियाँ करते हैं l राजा भीमचंद जी ने गुरु गोविन्द सिंह जी को बिलासपुर में आमंत्रित किया और उनसे निवेदन किया था कि कृपया आप ऐसा कार्य न करें जिससे हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचे, उस समय गुरु गोविन्द सिंह जी ने आश्वासन दे दिया था परन्तु बाद में न जाने ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने राजा भीमचंद जी के विरुद्ध युद्ध का आह्वान किया l 80000 की भीमचंद की सेना के सामने 8000 सिख सेना थी, और फिर भी सिख इतिहास में यह लिखा जाता है कि राजा भीमचंद जी ने भयाक्रांत होकर गुरु गोविन्द सिंह जी के सामने संधि का प्रस्ताव रखा l
Battle of Bhangani के बाद राजा भीमचंद जी ने गढवाल नरेश, मिथिला नरेश, नेपाल नरेश, दरभंगा नरेश आदि के साथ एक syndicate बनाई और औरंगजेब को tax देने से मना कर दिया गया l औरंगजेब ने अपनी सेना भेजी बिलासपुर की और परन्तु उस सेना ने पहले आनंदपुर के किले को ही घेर लिया l 8 महिनो तक आनंदपुर साहिब के किले के बाहर मुगल सेना डेरा डाल कर बैठी रही, कोई युद्ध नही हुआ इन 8 महीनों में l 8 महीनों बाद गुरु गोविन्द सिंह जी ने पंज प्यारों को पानी में बताशे घोल कर अमृत बना कर पिलाया और खालसा पन्थ का निर्माण किया l जिसके तुरंत बाद ही पंज प्यारों ने गुरु गोविन्द सिंह जी से यह निवेदन किया कि आप यहाँ से चले जाइए समय रहते, बाकी जो होगा वो हम देख लेंगे l गुरु गोविन्द जी अपने कुछ साथियों के साथ किले के गुप्त दरवाजे से अपने संघर्ष हेतु निकल पड़े l

उसके बाद चमकौर गढ़ी के युद्ध का उल्लेख प्राप्त होता है, वहां पर भी मुगल सेना डेरा डाल कर बैठी हुई थी l वहां पर गुरु गोविन्द जी पर खतरा था तो एक योजना बनाई गई जिसके अंतर्गत गनी खान और नबी खान नामक दो मुसलमानों ने गुरु गोविन्द सिंह जी को सूफियों की भांति नीले वस्त्र पहनने का अनुरोध किया l गुरु गोविन्द सिंह जी बहुत चतुर थे वो गनी खान और नबी खान की योजना समझ गये अत: टर्न एक रंगाई वाला बुलाया गया और एक वस्त्र कू नीले रंग में रंगवाया गया l फिर एक दो मंजिला पालकी बनवाई गई (A double-storeyed cell) जिसमे बिठा कर गुरु गोविन्द सिंह जी को एक महान सूफी संत बता कर मुगल सेना के बीच में से निकाल कर ले गये l और गुरु गोविन्द जी के प्राणों की रक्षा हुई l परन्तु कोई युद्ध नही हुआ l फिर भी इस महान युद्ध की महान विजय गाथा को “उच्च दा पीर” नामक गुरुद्वारा बना कर अतुलनीय सम्मान दिया जाता है l
http://www.sikhiwiki.org/index.php/Gurudwara_Uch_Da_Pir


उसके कुछ दिनों बाद गुरु गोविन्द सिंह जी ने औरंगजेब की मनसबदारी स्रीकार की और दक्षिण की और प्रस्थान किया l कुछ समय बाद औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात उसके बेटों की सत्ता प्राप्त ह्रेतु आपसी संघर्ष में गुरु गोविन्द सिंह जी ने औरंगजेब के बड़े बेटे को गद्दी पर बिठाने में सहायता भी की अन्यथा मुगल सत्ता समय समय के लिए लुप्तप्राय भी हो सकती थी l कुछ इतिहासकार मानते हैं कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि मुगल कमजोर न हों, मराठे शक्तिशाली न हों और सिख पन्थ को मराठों द्वारा या हिन्दू साम्राज्य द्वारा कोई हानि न पहुंचे l
दक्षिण की और प्रस्थान के बाद गुरु गोविन्द सिंह जी की भेंट एक मराठी ब्राह्मण लक्ष्मण दास भारद्वाज उर्फ़ संत माधव दास उर्फ़ बन्दा बैरागी उर्फ़ बन्दा सिंह बहादुर जी से हुई l लक्ष्मण दास भरद्वाज को अपनी युवावस्था में वैराग्य प्राप्त हुआ और वो साधना में लीन होकर एक महान संत हुए जिनसे उनका नाम हुआ संत माधव दास, कहते हैं कि उनके पास अनेक शक्तियाँ थीं l उन्होंने गुरु गोविन्द सिंह जी को अपने आश्रम में आश्रय दिया और अनेकानेक औषधि आदि से उनका उपचार एवं चिकित्सा का कार्य किया l बाद में गुरु गोविन्द सिंह जी पर हुए अत्याचार का बदला लेने हेतु संत माधव दास उर्फ़ बन्दा बैरागी उर्फ़ बना सिंह बहादुर उत्तर भारत कि और प्रस्थान कर गये l
लक्ष्मण दास भरद्वाज को कुछ इतिहासकार हिमाचल या जम्मू का डोगरा राजपूत भी बताते हैं l
उत्तर भारत में पहुँचने के बाद बन्दा सिंह बहादुर उर्फ़ बन्दा बैरागी ने सभी हिन्दुओं और सिखों को लेकर एक सेना बनाई और सबको प्रशिक्षित किया, उन्हिएँ तीरंदाजी, तलवार बाजी, मार्शल आर्ट आदि सब सिखा कर युद्ध का में पारंगत किया l आज सिखों के महोत्सवों में जो हैरत अंगेज़ कारनामे किये जाते हैं वो सब बन्दा बैरागी जी की ही देन है l बन्दा बैरागी ने अपने युद्ध कौशल से करनाल, जीन्द, सहारन पूत, महेंद्र गढ़, पटियाला, आदि सब क्षेत्र जीत लिए और सभी भूमि उन्होंने ग़रीबों में बाँट दी l जब बन्दा बैरागी ने लाहौर की और आक्रमण किया तो औरंगजेब के दुसरे बेटे फर्रुखसियर जो कि अपने भाई से गद्दी हथिया चूका था उसने गुरु गोविन्द सिंह जी की दूसरी पत्नी माता सुन्दरी देवी तथा दूसरी पत्नी जिन्हें गुरु गोविन्द सिंह जी की अध्यात्मिक पत्नी कहा जाता है, दोनों फर्रुखसियर की नजरबंदी में दिल्ली में रह रही थीं l मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने दोनों गुरु माताओं से यह आग्रह किया कि बन्दा बैरागी कोई रोकें लाहौर पर आक्रमण करने से बदले में सबको जागीर तथा धन आदि देने का आश्वासन दिया l गुरु माताओं ने पहला पत्र लिखा बन्दा बैरागी को जिसके उत्तर में बन्दा बैरागी ने लिखा कि मैं नही रुकुंगा मैं गुरु के साथ हुए अत्याचार का बदला लेने आया हूँ l दुसरे पत्र में भी गुरु माताओं ने ऐसा ही निवेदन किया परन्तु बन्दा बैरागी ने पुन: साफ़ मना कर दिया l तीसरा पत्र गुरु माताओं ने बन्दा बैरागी की सेना के सिख जनरल विनोद सिंह को लिखा और आदेश दिया कि बन्दा बैरागी का साथ न दें l अगले दिन लाहौर के किले पर जब आक्रमण किया गया तो चलती लड़ाई से बन्दा बैरागी की सेना के सभी सिख मुगलों के साथ जाकर खड़े हो गये l और बन्दा बैरागी को पीछे हटना पड़ा l
http://www.sikhiwiki.org/index.php/Mata_Sahib_Devan



अगले दिन पुन: जब बन्दा बैरागी लाहौर पर आक्रमण हेतु अपने किले से बाहर निकले तो मुगलों ने चालाकी की और सभी सिखों को मुगल सेना के सबसे आगे खड़ा कर दिया गया l बन्दा बैरागी असमंजस में पड़ गये कि इन बच्चों को तो मैंने अपने हाथों से प्रशिक्षित किया है इन पर मैं शस्त्र कैसे चलाऊं ?बन्दा बैरागी और कई सैनिकों को किले के अंदर रहना पड़ा कई महीनों तक l
कई महीनों बाद बन्दा बैरागी के किले में जब राशन पानी आदि समाप्त हो गया था तो लोगों को मरता देख कर बन्दा बैरागी ने आत्म समर्पण किया l बन्दा बैरागी और उनके सैकड़ों साथियों को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया l बन्दा बैरागी तथा सभी साथियों को दिल्ली के चांदनी चौक समेत कई इलाकों में रेहड़ी पर एक पिंजरा बना कर उसमे बिठा कर नुमाइश के लिए बिठाया जाता था l लोग उन पर तरह तरह की फब्तियां कसते और मल मूत्र आदि फेंकते रहते थे l दिल्ली के महरौली के पास स्थित क़ुतुब मीनार के पास सन 1716 में बन्दा बैरागी को इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया परन्तु बन्दा बैरागी ने नही किया l उनके 4 वर्ष के छोटे पुत्र को भी इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया परन्तु वो न माना और मुगलों ने 4 वर्षीय पुत्र का दिल निकाल कर बन्दा बैरागी के मुंह में डालने का प्रयास किया गया l अगली सुबह ब्रह्म-मुहूर्त में बन्दा बैरागी ने अपने 8 वर्षीय बड़े पुत्र के साथ समाधी के माध्यम से ब्रह्मलीन हुए l
1716 से 1780 के आसपास तक सिख पन्थ छोटी छोटी मिसिलों में अपने कार्य करता रहा l फिर महाराजा रणजीत सिंह का उदय हुआ l मराठा नेता रघुनाथ राव ने लाहोर का किला जीतकर महराजा रणजीत सिंह जी को उपहार में दिया l
परन्तु इतिहास पुन: दोहराया गया lजब मराठा नेता होलकर अंग्रेजों के विरुद्ध अपने विजय अभियान की सफलता के निर्णायक दौर में था तब अंग्रेजों को सिखों ने पुन: सहायता दी l लाहौर के राजा रणजीत सिंह, पटियाले के रणधीर सिंह और कपूरथला के जस्सा सिंह ने अंग्रेजों से एक संधि की और अंग्रेजों को बहुत सा धन और बहुत बड़ी सेना की सहायता दी l
इस एतिहासिक विश्वासघात के कारण मराठा नेता होलकर की हार हुई l

इतिहासकार मानते हैं कि यदि सिखों ने यह विश्वासघात न किया होता और अंग्रेजों को कोई सहायता न प्राप्त होती तो शायद अंग्रेजों को 1857 से 40-50 वर्ष पहले ही खदेड़ दिया गया होता l
1857 के युध्द में भी सिखों ने अंग्रेजों का ही साथ दिया और स्व्त्नत्र्र्ता संग्राम में अंग्रेजों को विजयी बनाया l उसके बाद भारत विभाजन की प्रक्रिया के समय अकाली दल का मास्टर तारा सिंह जो कि जिन्ना का मित्र भी था उसने क्रिस्प कमीशन से जाकर सिक्खों के लिए एक अलग देश की मांग की जिसका नाम था खालिस्तान l क्रिस्प को खालिस्तान विषय पर कुछ ज्ञान नही था अधिक तो उसने मास्टर तारा सिंह को कहा कि वो एक सर्वे करे पूरे पंजाब का, और यदि मास्टर तारा सिंह पूरे पंजाब (भारत-पाकिस्तान ) में से एक भी सिख बहुसंख्यक जिला सिद्ध कर देगा तो वो खालिस्तान की मांग पर भी विचार करेगा l
क्रिस्प को समय भी मिल गया, अंतत: मास्टर तारा सिंह उस समय एक भी सिख Majority जिला पूरे पंजाब सूबे में नही दिखा पाया और उसका खालिस्तान का सपना अधूरा रह गया l उसके बाद भी खालिस्तान की मांग को लेकर अकाली दल और मास्टर तारा सिंह नेहरु के चक्कर लगाते रहे परन्तु नेहरु ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया l उस समय PEPSU नामक एक राज्य होता था भारत में जिसका नाम है (Eastern Punjab & Patiala State Union), इस PEPSU राज्य का बोर्डर पहले दिल्ली के पास होता था l मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने पहले भाषा के आधार पर PEPSU राज्य का विभाजन करवाया l पटियाले से उस तरफ गुरुमुखी लिपि को राज्य में लागू कर दिया गया l और अम्बाला से इस तरफ देव्नागरी लिपि ही रही l उसके बाद नवम्बर 1966 को मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने मिलकर PEPSU राज्य को तीन राज्यों में बाँट दिया (Trifurcation) गया और पंजाब, हरियाणा, तथा हिमाचल प्रदेश का निर्माण हुआ l कालचक्र कहिये या कुछ भी बाद में मास्टर तारा सिंह की पुत्री की हत्या भी खालिस्तान आतंकवादियों द्वारा ही की गई l
https://thaluaclub.in/2014/07/22/sikh-and-hindu/

गंगू ब्राह्मण का बलिदान

पंजाब के सिख ब्राह्मणों के बारे में बहुत कुछ अपमानजनक कहते सुनते पाए जाते हैं | फिल्मों में ब्राह्मणों को या तो कोमेडी पात्र दिखाया जाता या चुटकुले बनाये जाते हैं | फेसबुक पर कई पेज ग्रुप हैं जिनके नाम का अगर हिंदी में मतलब निकाला जाए तो कुछ ऐसे है “बामणी लगाये ट्राई , जट ने भी बहुत फसाई”, “रंगीन जट , शोकीन बामणी”, और ऐसे ही कई पेज आपको मिल जायेंगे जहाँ पंडितों का मजाक बनाया जाता है | ऐसे ही अक्सर बड़े सिख नेता ब्राह्मण विरोधी ब्यान देते सुने जाते हैं जिनमे इनके सबसे बड़े ग्रंथि अवतार सिंह मक्कड का भी नाम है |
इसका कारण यह कहा जाता है की गंगू नाम के ब्राह्मण ने गुरु के बेटे का पता मुगलों को बताया था | पर ब्राह्मणों से नफरत और इस साज़िश का कारण जानने के लिए थोडा इतिहास में जाना होगा | अक्सर कहा जाता है की सिख गुरु के आगे कश्मीरी पंडितों ने हाथ फैलाये तो गुरु साहिब ने हिंदू धर्म की रक्षा की | हिंदुओं की माँ बहने मुग़ल उठा कर ले जाते थे और हिंदू उन्हें बचा नहीं पाते थे | ऐसे ताने हमें सुनने को मिलते हैं की तुम अब्दाली के आगे छक्के बन जाते थे |

पहले तो में शुरू करूँगा गंगू ब्राह्मण से , गंगू ब्राह्मण ने कभी गुरु को धोखा नहीं दिया था | बल्कि उसने गोबिंद सिंह के बच्चों को अपने घर में शरण दी थी , उनको मुगलों से बचाने के लिए | एक दिन जब गंगू राशन लेने गया तो दुकानदार ने पूछा की गंगू तू अकेला रहता है , इतना राशन क्या करेगा , तो भोले भाले गंगू ने कह दिया की किसी को बताना मत, गुरु के बच्चे मेरे यहाँ छिपे हुए हैं और ऐसे वो बात बाहर फ़ैल गयी |
गंगू ब्राह्मण एक 21 ब्राहमणों की टोली के साथ आया था जिसका नेतृत्व एक कृपा शंकर नाम का ब्राह्मण कर रहा था और सब के सब वीरगति को प्राप्त हुए थे l
गंगू ब्राह्मण उनके खाने पीने का ध्यान रखता था, उसे गुरु साहिबान के शेह्जादों की देखरेख का दायित्व दिया गया था l उसकी चूक केवल इतनी ही थी कि उसके मूंह से एक छिपी रहने वाली बात निकल गई और केवल सिंह नाम सिख ने इसकी मुखबिरी मलेर-कोटला के कोतवाल को दे दी और शेह्जादे तथा माता गूज्जरी जी को गिरफ्तार कर लिया गया l
जिस काल कोठरी में माता गूजरी जी और शेह्जादों को रखा गया था वो पीछे की और से खुली हुई थी जिसके पीछे एक नदी बहती थी l
दिसम्बर का महीना था और कडाके की ठंड थी, फिर भी मोती राम मेहरा नामक एक हिन्दू खत्री (क्षत्रिय) अपनी जान पर खेलकर नदी के मुंहाने से होता हुआ वहां जाकर उन्हें गर्म गर्म दूध पिला कर आता था l बाद में जब इसका भेद खुला तो मोती राम मेहरा को आटा पीसने वाली चक्की के बीच पीसकर मार डाला गया l
गुरु साहिबान के शेह्जादों मलेर कोटला के नवाब द्वारा नृशंस हत्या कर देने के बाद उनके अंतिम संस्कार हेतु कोई भी सिख सामने नही आया था, यह भय था या खौफ यह तो ज्ञात नही परन्तु फिर एक टोडरमल नाम का वैश्य सामने आया जिसने उस समय 7800 स्वर्ण मुद्राएं धरती बिछा कर उतनी भूमि खरीदी जितने पर गुरु साहिबान के शेह्जादों का अंतिम संस्कार हो सके l
आज के समय में 7800 स्वर्ण मुद्राओं की कीमत लगभग 30 मिलियन डॉलर बनती हैं l भारतीय मुद्रा में लगभग 150 करोड़ से 180 करोड़ रूपये बैठती है l परन्तु इस महान अभूतपूर्व सहयोग की भी सिख इतिहास में कोई पूछ नही न ही कहीं लिखा पढ़ाया जाता है l
https://thaluaclub.in/2014/07/22/sikh-and-hindu/

श्री गुरु तेग बहादुर

संसार को ऐसे बलिदानियों से प्रेरणा मिलती है, जिन्होंने जान तो दे दी, परंतु सत्य का त्याग नहीं किया। नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी भी ऐसे ही बलिदानी थे। गुरु जी ने स्वयं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों एवं विश्वासों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। अपनी आस्था के लिए बलिदान देने वालों के उदाहरणों से तो इतिहास भरा हुआ है, परंतु किसी दूसरे की आस्था की रक्षा के लिए बलिदान देने की एक मात्र मिसाल है-नवम पातशाह की शहादत। औरंगजेब को दिल्ली के तख्त पर कब्जा किए 24-25 वर्ष बीतने को थे। इनमें से पहले 10 वर्ष उसने पिता शाहजहां को कैद में रखने और भाइयों से निपटने में गुजारे थे। औरंगजेब के अत्याचार अपने शिखर पर थे। बात 1675 ई. की है। कश्मीरी पंडितों का एक दल पंडित किरपा राम के नेतृत्व में गुरु तेग बहादुर जी के दरबार में कीरतपुर साहिब आया और फरियाद की- हे सच्चे पातशाह, कश्मीर का सूबेदार बादशाह औरंगजेब को खुश करने के लिए हम लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहा है, आप हमारी रक्षा करें। यह फरियाद सुनकर गुरु जी चिंतित हो उठे। इतने में, मात्र नौ वर्षीय श्री गुरु गोविंद सिंह बाहर से आ गए। अपने पिता को चिंताग्रस्त देखकर उन्होंने कारण पूछा। गुरु पिता ने कश्मीरी पंडितों की व्यथा कह सुनाई। साथ ही यह भी कहा कि इनकी रक्षा सिर्फ तभी हो सकती है, जब कोई महापुरुष अपना बलिदान करे। बालक गोविंद राय जी ने स्वाभाविक रूप से उत्तर दिया कि इस महान बलिदान के लिए आपसे बडा महापुरुष कौन हो सकता है? नवम पातशाह ने पंडितों को आश्वासन देकर वापस भेजा कि अगर कोई तुम्हारा धर्म परिवर्तन कराने आए, तो कहना कि पहले गुरु तेग बहादुर का धर्म परिवर्तन करवाओ, फिर हम भी धर्म बदल लेंगे। नवम पातशाह औरंगजेब से टक्कर लेने को तैयार हो गए। बालक गोविंद राय को गुरुगद्दी सौंपी और औरंगजेब से मिलने के लिए दिल्ली रवाना हो गए। औरंगजेब ने गुरु जी को गिरफ्तार किया और काल-कोठरी में बंद कर दिया। गुरु जी के सामने तीन शर्ते रखी गई- या तो वे धर्म परिवर्तन करें या कोई करामात करके दिखाएं या फिर शहादत को तैयार रहें। गुरु जी ने पहली दोनों शर्ते मानने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप गुरु जी के साथ आए तीन सिखों-भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला को यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया। गुरु जी इन सबके लिए पहले से ही तैयार थे। उन्होंने कहा-मैं धर्म परिवर्तन के खिलाफ हूं और करामात दिखाना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। गुरु जी को आठ दिन चांदनी चौक की कोतवाली में रखा गया। उन पर अत्याचार किया गया, परंतु वे अचल रहे और अंतत: नानकशाही तिथि पत्रानुसार 24 नवंबर 1675 के दिन उन्हें चांदनी चौक में शहीद कर दिया गया। गुरु जी के एक सिख भाई जैता जी ने गुरु जी के शीश को आनंदपुर साहिब लाने की दिलेरी दिखाई। गुरु गोविंद सिंह जी ने भाई जैता के साहस से प्रसन्न होकर उन्हें रंगरेटे-गुरु के बेटे का खिताब दिया। गुरु जी के शीश का दाह-संस्कार आनंदपुर साहिब में किया गया। गुरु जी के शरीर को भाई लखी शाह और उनके पुत्र अपने गांव रकाबगंज ले गए और घर में आग लगाकर गुरु जी का दाह-संस्कार किया। आज यहां गुरुद्वारा रकाबगंज, दिल्ली सुशोभित है। दिल्ली में आज भी गुरुद्वारा शीशगंज नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी की बेमिसाल शहादत की याद दिलाता है। आज भी लोग उन्हें हिंद की चादर कह कर याद करते हैं।
https://thaluaclub.in/2014/07/22/sikh-and-hindu/

अफ़ज़ल खान द्वारा अपनी 63 पत्नियों की हत्या

कोई शासक अपनी 63 पत्नियों को सिर्फ़ इसलिये मार डाले कि कहीं उसके मरने के बाद वे दोबारा शादी न कर लें… है ना आश्चर्यजनक बात!
लेकिन सच है…यूँ तो कर्नाटक के बीजापुर में गोल गुम्बज और इब्राहीम रोज़ा जैसी कई ऐतिहासिक इमारतें और दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन एक स्थान ऐसा भी है जहाँ पर्यटकों को ले जाकर इस्लामी आक्रांताओं के कई काले कारनामों में से एक के दर्शन करवाये जा सकते हैं। बीजापुर-अठानी रोड पर लगभग 5 किलोमीटर दूर एक उजाड़ स्थल पर पाँच एकड़ में फ़ैली यह ऐतिहासिक कत्लगाह है।
“सात कबर” (साठ कब्र का अपभ्रंश) ऐसी ही एक जगह है। इस स्थान पर आदिलशाही सल्तनत के एक सेनापति अफ़ज़ल खान द्वारा अपनी 63 पत्नियों की हत्या के बाद बनाई गई कब्रें हैं। इस खण्डहर में काले पत्थर के चबूतरे पर 63 कब्रें बनाई गई हैं।
इतिहास कुछ इस प्रकार है कि एक तरफ़ औरंगज़ेब और दूसरी तरफ़ से शिवाजी द्वारा लगातार जारी हमलों से परेशान होकर आदिलशाही द्वितीय (जिसने बीजापुर पर कई वर्षों तक शासन किया) ने सेनापति अफ़ज़ल खान को आदेश दिया कि इनसे निपटा जाये और राज्य को बचाने के लिये पहले शिवाजी पर चढ़ाई की जाये। हालांकि अफ़ज़ल खान के पास एक बड़ी सेना थी, लेकिन फ़िर भी वह ज्योतिष और भविष्यवक्ताओं पर काफ़ी भरोसा करता था। शिवाजी से युद्ध पर जाने के पहले उसके ज्योतिषियों ने उसके जीवित वापस न लौटने की भविष्यवाणी की। उसी समय उसने तय कर लिया कि कहीं उसकी मौत के बाद उसकी पत्नियाँ हिन्दुओ से दूसरी शादी न कर लें, सभी 63 पत्नियों को मार डालने की योजना बनाई।अफ़ज़ल खान अपनी सभी पत्नियों को एक साथ बीजापुर के बाहर एक सुनसान स्थल पर लेकर गया। जहाँ एक बड़ी बावड़ी स्थित थी, उसने एक-एक करके अपनी पत्नियों को उसमें धकेलना शुरु किया, इस भीषण दुष्कृत्य को देखकर उसकी दो पत्नियों ने भागने की कोशिश की लेकिन उसने सैनिकों को उन्हें मार गिराने का हुक्म दिया। सभी 63 पत्नियों की हत्या के बाद उसने वहीं पास में सबकी कब्र एक साथ बनवाई।
आज की तारीख में इतना समय गुज़र जाने के बाद भी जीर्ण-शीर्ण खण्डहर अवस्था में यह बावड़ी और कब्रें काफ़ी ठीक-ठाक हालत में हैं। यहाँ पहली दो लाइनों में 7-7 कब्रें, तीसरी लाइन में 5 कब्रें तथा आखिरी की चारों लाइनों में 11 कब्रें बनी हुई दिखाई देती हैं और वहीं एक बड़ी “आर्च” (मेहराब) भी बनाई गई है, ऐसा क्योंऔर किस गणित के आधार पर किया गया, ये तो अफ़ज़ल खान ही बता सकता है। वह बावड़ी भी इस कब्रगाह से कुछ दूर पर ही स्थित है।
अफ़ज़लखान ने खुद अपने लिये भी एक कब्र यहीं पहले से बनवाकर रखी थी। हालांकि उसके शव को यहाँ तक नहीं लाया जा सका और मौत के बाद प्रतापगढ़ के किले में ही उसे दफ़नाया गया था, लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि वह अपनी मौत को लेकर बेहद आश्वस्त था, भला ऐसी मानसिकता में वह शिवाजी से युद्ध कैसे लड़ता?
हिन्दुओ की शान महान योद्धा शिवाजी के हाथों अफ़ज़ल खान का वध प्रतापगढ़ के किले में 1659 में हुआ था।।

क्या ॐ शब्द से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ

धर्म,भगवान और ब्रह्माण्ड का सही ज्ञान
कम्पन, फ्रैक्‍टल, बुद्ध, ब्रह्माण्ड, भगवान, मन  जब कुछ भी नहीं था, यानी की सिर्फ विलक्षणता (Singularity) थी….
क्या ॐ शब्द से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ

कहा जाता हैं तब एक प्रारम्भिक शब्द (ध्वनि) उत्पन्न हुआ. जो एक महाविस्फोट था. बिग बेंग. कहा जाता हैं की हमारा यह भौतिक ब्रह्माण्ड इस प्रारंभिक बिंदु से ही अस्तित्व मैं आया. एक परमाणु से भी अरबो गुना छोटा यह बिंदु क्यों और कैसे अस्तित्व मैं आया यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ हैं. इस बिन्दु से अचानक ब्रह्माण्ड का अनंत रूप से विस्तार होने लगा. लेकिन कोई नहीं जानता कैसे. कोई चीज़ भले ही कितनी भी रहस्यमय और अकल्नीय हो, इंसानों को लगता हैं की वे उसे जान चुके हैं. भौतिकशास्त्रीयों का मानना हैं की ब्रह्माण्ड मैं केवल 4% जितना ही परमाणु पदार्थ हैं, 23% अविज्ञ पदार्थ और 73% निष्क्रिय उर्जा हैं. यह उर्जा जिसे हम खाली जगह या empty space के रूप मैं जानते हैं. यह एक अद्रश्य सिस्टम हैं जो ब्रह्माण्ड मैं सभी चीजों को एकसाथ जोड़कर संचालित होता हैं.
प्राचीन वेदों के अनुसार आवाज (voice) ही सबकुछ हैं. आवाज ब्रह्म हैं. हमारा ब्रह्माण्ड कम्पित हो रहा हैं. और कम्पित हो रहा यह क्षेत्र सारे मूल आध्यात्मिक अनुभवों और वैज्ञानिक अन्वेषणों का आधार है. उर्जा का एक क्षेत्र जिसे बुद्धिमान पुरुषों, योगियों और संतोने अपने भीतर खोजा और इसे महसूस किया हैं. जिसे हमारे समस्त इतिहास मैं ब्रह्मांडीय संगीत, आकाश, ओम और बिग बेंग जैसे नाम दीए गए हैं. सबसे ज्यादा चर्चास्पद नाम रहा हैं : “ भगवान ”. इसका उल्लेख दुनिया के सभी धर्मो मैं हैं और यहीं हमारी अन्दर की और बाहर की दुनिया को जोड़ता हैं.

हमारे ब्रह्माण्ड की आज के समय में जो व्याख्या की जाती हैं वह प्राचीन काल में अलग अलग धर्मो में की गयी व्याख्या से ज्यादा अलग नहीं हैं. अमेरिका के 20वी सदी के महँ वैज्ञानिक निकोला टेस्ला, जिन्होंने प्रत्यावर्ती विद्युत धारा की खोज की थी, उन्हें प्राचीन वैदिक परंपराओं में ज्यादा रूचि थी. निकोला टेस्ला पूर्वी संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति दोनों के माध्यम से विज्ञान को समजना चाहते थे. अन्य वैज्ञानिको की तरह टेस्लाने ब्रह्माण्ड के रहस्यों को गहरे से देखने के साथ साथ अपने भीतर की गहराई में भी झाँका. किसी योगी की तरह स्वर्गिक अनुभव को वर्णित करते हुए आकाश (Aakasha) शब्द का प्रयोग किया. जो सभी चीजों में व्याप्त हैं. इसके लिए निकोला टेस्लाने भारत के स्वामी विवेकानंद के साथ मिलकर इस विषय का अभ्यास किया. स्वामी विवेक नन्द, जिन्होंने भारत की प्राचीन वैदिक शिक्षा और संस्कृति को पश्चिमी देशों तक पहुँचाया था. वैदिक शिक्षा के अनुसार आकाश खुद शून्य हैं, जिसमे अन्य सारे तत्व भरे हुए हैं. यह तत्व इस शून्य में कम्पित होते हुए उपस्थित रहते हैं. यह एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं. आकाश, अन्तरिक्ष या खाली जगह यिन हैं और इसके अंदर का पदार्थ यांग हैं.
फ्रैक्‍टल (Fractal)
कंप्यूटरों मैं लगातार हो रही प्रगति ने 1980 के दशक के बाद से समग्र ब्रह्माण्ड की प्रकृति के गणितीय ढांचे की गणितीय कल्‍पना कर उसे वास्तविक रूप में पहचानने का हमें अवसर दिया हैं. “ फ्रैक्‍टल (Fractal) “ अर्थात अंश (भाग) शब्‍द का गठन सन 1980 में गणितज्ञ बेनॉयट मेंडेलब्रॉट ने किया था. उन्‍होंने जब कुछ गणितीय समीकरणों का अध्‍ययन करने पर पाया कि एक सीमित दायरे में दोहराने पर यह फ्रैक्‍टल्स अंतहीन गणितीय अथवा ज्‍योमितीय रूप में बदलती हैं. वे सीमित हैं लेकिन साथ ही अनंत भी. एक अंश एक स्थूल ज्‍यामितीय आकार होता है, जिसे अनेक हिस्‍सों में वि‍भाजित किया जा सकता है, ऐसे विभाजित किए हुए हिस्सों के अनंत हिस्से हो सकते हैं और उनके भी अनत हिस्से. जिनमें से प्रत्‍येक लगभग संपूर्ण आकार का संक्षिप्त प्रतिरूप है. इस गुण को “ समरूपता “ कहा जाता है. मेंडेलब्राट के इस “ अंश “ की छाप को ईश्‍वर के अंगूठे की छाप कहा जाता हैं. यदि आप मेंडेलब्राट की इस फ्रैक्‍टल की आकृति को एक विशिष्ट तरीक़े से घुमाएँ तो यह किसी हिन्‍दू देवता अथवा भगवान बुद्ध के जैसा दिखाई देता हैं जिसको “ बुद्धब्राट “ आकार` नाम से भी जाना जाता हैं.
अगर आप प्राचीन स्थापत्यकला को ध्यान से देखेगे तो आप पाएंगे कि प्राचीन मनुष्य जातियां काफी लंबे समय से उनकी सौंदर्य और पवित्रता को फ़्रैक्टल पैटर्न के साथ जोड़ते आए हैं. अत्‍यंत जटिल, लेकिन फि‍र भी कण-कण में उसकी पूर्णता का बीज होता है. फ्रैक्‍टल्‍स ने ब्रह्माण्ड और इसकी संचालन प्रक्रिया पर बहुत सारे गणितज्ञों का दृष्टिकोण बदला है. आवर्धन के हर एक नए स्‍तर के साथ, मूल से भिन्‍नता उजागर होती हैं. जब हम फ्रैक्टल के एक स्‍तर से दूसरे स्‍तर पर पारगमन करते हैं तो ब्रह्माण्डीय सर्पिल गति में सतत परिवर्धन एवं रूपांतरण घटित होता है. दिक्काल के सांचे में सन्निहित बुद्धिमता. फ्रैक्‍टल्‍स यानी सहज रूप से अस्तव्यस्त किन्तु शब्‍द एवं नियम से भरपूर हैं.


मंगल ग्रह पर पानी

हमारे मस्तिष्‍क किसी आकार को जब पहचानकर उसको परिभाषित करता हैं, तब हम उस पर इस तरह ध्यान केन्द्रित करते हैं जैसे वह कोई वस्तु हो. हम हमेशां आकारों को हमारे द्वारा देखी गई सुंदरता के अनुरूप ढूंढते हैं, लेकिन अपने मस्तिष्क में इन आकारों को बनाए रखने के क्रम में हमें शेष फ्रैक्‍टल्‍स को हटा देने चाहिए. फ्रैक्‍टल्‍स को चेतनाओं में समाविष्‍ट करने का मतलब हैं फ्रैक्‍टल्‍स का संचालन सीमित करना है. ब्रह्माण्‍ड में मौजूद सारी ऊर्जा तटस्‍थ, शाश्‍वत और आयामहीन है. हमारी अपनी रचनात्‍मकता और आकारों को पहचानने की क्षमता सूक्ष्‍म जगत एवं ब्रह्माण्‍ड के बीच की कड़ी है. यह लहरों और ठोस वस्‍तुओं का शाश्वत जगत हैं. चिंतन की स्‍वभाविक सीमाओं में अवलोकन करना एक सृजनात्मकता है क्योंकि हम वर्गीकरण के द्वारा नाम देकर, किसी भी चीज़ के ठोसपन का भ्रम पैदा करते हैं.
दार्शनिक कीर्केगार्ड ने कहा था की ” यदि आप मेरा नाम रखते हैं तो आप मुझे नकारते हैं. मेरा नाम रखकर, वर्गीकरण कर, आप उन सभी अन्‍य चीजों को नकार देते हैं जिनकी मुझमें होने की संभावना हो सकती है. आप किसी चीज़ या कण को उसका एक अलग नाम देकर उसको एक वस्‍तु के रूप में व्‍याख्‍यायित कर देते हैं, आप उसके अस्तित्‍व को परिभाषित कर उसका सर्जन कर देते हैं. ” सर्जनात्‍मकता हमारी सर्वोच्‍च प्रकृति है. क्योंकि वस्‍तुओं के सर्जन से ऐसी स्थिति बनती है जब चीजों में ठोसपन का भ्रम हो.
आल्बर्ट आइन्‍सटीन ऐसे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने यह जाना कि जिस अंतरिक्ष को हम शून्‍य मानते हैं, वास्तव में वह ऐसा है नहीं, बल्कि उसकी कई विशेषताएं हैं. अंतरिक्ष की प्रकृति अनंत आंतरिक ऊर्जा से भरपूर है. भौतिकशास्त्री रिचर्ड फैनमेन के मुताबिक, ” अंतरिक्ष के अकेले क्‍यूबिक मीटर में इतनी ऊर्जा है कि विश्‍व के सभी महासागर उबल सकें. ” अधिकतम ऊर्जा स्थिर और शांत हैं. बुद्ध इसे “ कल्प “ कहते थे. कल्प किसी सूक्ष्‍म कणों अथवा तरंगिकाओं की तरह हैं जो प्रति सेकंड खरबों बार उत्‍पन्‍न व लुप्‍त होती हैं. यह किसी स्वलिखित फ़िल्म कैमरे में तेज गति से चलती गतिशील फ़्रेमों की शृंखला द्वारा सातत्य का भ्रम पैदा करने के समान है. यह भ्रम केवल चेतना के रूरी तरह से स्थिर होने पर समझा जा सकता है. क्योंकि यह चेतना ही है जो भ्रम को संचालित करती है.

दुनिया की ज्यादातर प्राचीन संस्कृतियों में यह समजा गया हैं की ब्रह्माण्ड मैं सबकुछ कंपायमान हैं. नाद ब्रह्म हैं. ब्रह्माण्‍ड एक ध्‍वनि है. “ नाद ब्रह्म ” – नाद यानी ध्वनि और ब्रह्म यानी इश्वर. कलाकार और कला अभिन्‍न हैं. प्राचीन योगियों ने यह माना की चेतना का मूल एक आधार होता है. वर्तमान और भविष्‍य की सभी जानकारियां तथा अनुभव अभी अस्तित्‍व में हैं और सदा रहते हैं. यह वही क्षेत्र है जहाँ से सभी चीज़े अस्तित्व में आती हैं. अणुओं और परमाणुओं से लेकर आकाशगंगा और पूरे ब्रह्माण्ड के जीवन चक्र तक. आप इसे समग्रता में कभी नहीं देख पाते, क्‍योंकि यह कंपन परत-दर-परत पर बना है और निरंतर परिवर्तनशील है.

लेकिन आपका जब विचारशील मस्तिष्‍क शांत होता हैं, तब आप यथार्थ को वास्‍तविक रूप में देख सकते हैं. सभी अवस्‍थाएं एक साथ. वृक्ष, आकाश, पृथ्‍वी, वर्षा तथा सितारे एकसाथ. जीवन और मृत्‍यु हमारी अपनी या किसी अन्‍य की, पृथक नहीं हैं. ठीक वैसे ही जैसे पर्वत और वादियां अभिन्‍न हैं. अमेरिका की आदिवासी परंपराओं में यह कहा गया है कि प्रत्‍येक वस्‍तु में जीव है जिसे अन्य तरीक़े से कहे तो प्रत्‍येक वस्‍तु स्‍पंदनशील स्रोत से संबद्ध है. सर्वत्र एक चेतना, एक व्‍यापकता, एक ऊर्जा व्याप्त है. यह व्याप्ति आपके आसपास नहीं, बल्कि यह आपके माध्‍यम से घटित हो रही है और आपके वास्‍तविक स्वरूप के अनुसार घटित हो रही है. आप नेत्र हैं जिनके माध्‍यम से सृजक स्‍वयं को देखता है. स्‍वप्न से बाहर आने पर आप महसूस करते हैं कि स्‍वप्न में सब कुछ आप ही थे. आप इसे सृजित कर रहे थे. प्रत्‍येक व्‍यक्ति और प्रत्‍येक वस्‍तु आप हैं. प्रत्‍येक नेत्र की चेतन दृष्टि, प्रत्‍येक चट्टान के नीचे छिपे प्रत्‍येक अणु के भीतर तक देखती है. जिस द्रष्टि से हम हम ब्रह्माण्ड या प्रारंभिक सिद्धांत का क्षेत्र देखते हैं और वह दृष्टि जिससे क्षेत्र हमें देखता है, दोनों एक ही है.


समय यात्रा Time Travel
प्रत्‍येक पदार्थ कंपन से भरपूर है, किन्तु किसी स्थिर चीज़ को देखकर ऐसा बिलकुल नहीं लगता हैं क्योंकि कोई चीज कंपित हो रही हैं. ऐसा लगता लगता है जैसे मानो कोई अदृश्‍य नर्तक ब्रह्मांड की नृत्‍य-नाटिका में छिप कर छाया नृत्य कर रहा हैं. अन्‍य सभी नर्तक हमेशा इस छिपे नर्तक के आसपास नृत्‍य करते हैं. लेकिन हमने नृत्‍य की नृत्‍यकला देखी लेकिन अब तक उस नर्तक को नहीं देख सके.

जर्मन लेखक और विद्वान वुल्‍फगेंग वॉन गोयथे ने कहा की, ” तरंग आदिकालीन तथ्‍य है जिससे विश्‍व उत्पन्न हुआ “. सिमेटिक दृश्‍य ध्‍वनि का अध्‍ययन है. सिमेटिक शब्‍द ग्रीक के मूल शब्‍द “ साईमा “ से बना हैं, जिसका अर्थ है – तरंग या कंपन. तरंगीय तथ्य का गंभीरता से अध्‍ययन करने वालों में प्रथम पश्चिमी वैज्ञानिक अर्नस्‍ट श्लाड्नी थे. वह अठारहवीं शताब्‍दी का एक जर्मन संगीतज्ञ एवं भौतिक विज्ञानी था. श्लाड्नी ने खोज की कि धातु की प्‍लेटों पर रेत फैला कर वायलन गज से जब प्‍लेटों को डुलाया गया, तो रेत स्‍वत: प्रतिकृतियों में व्‍यवस्थित हो गई. उत्‍पादित कंपन के आधार पर भिन्‍न–भिन्‍न ज्‍यामितिक स्वरूप दृष्टिगोचर हुए. श्लाड्नी ने इन रूपों की समूची तालिका रिकार्ड की, जिन्‍हें श्लाड्नी आकृतियों के रूप में उल्लिखित किया जाता है. इनमें कई प्रतिकृतियों को समग्र प्राकृतिक विश्‍व में देखा जा सकता है. जैसे कछुए या तेंदुए की चित्तियों की प्रतिकृतियों के निशान. श्लाड्नी की प्रतिकृतियों या साइमेटिक प्रतिकृतियों का अध्‍ययन एक गोपनीय विधि है जिसके माध्यम से उन्नत गिटार, वॉयलिन और अन्‍य वाद्ययंत्रों के निर्माता वाद्ययंत्रों की ध्‍वनि गुणवत्‍ता का निर्धारण करते हैं.

हैंस जेनी ने वर्ष 1960 में श्लाड्नी का कार्य आगे बढ़ाया और ध्‍वनि नैरंतर्य को विकसित करने के लिए विभिन्‍न द्रव्य एवं इलेक्‍ट्रॉनिक प्रवर्धकों का प्रयोग किया एवं `सिमेटिक्‍स` (तरंग) ध्‍वनि का सृजन किया. यदि आप जल में सामान्‍य तरंगों की ओर दौड़ते हैं तो आप जल में प्रतिकृतियां देख सकते हैं. तरंग की आवृत्ति के आधार पर विभिन्‍न तरंगित प्रतिकृतिया दृष्टिगोचर होंगी. आवृत्ति के बढ़ने पर प्रतिकृति जटिल होती जाएगी. इन स्वरूपों की पुनरावृति होगी, लेकिन ये बेतरतीब नहीं होंगी. जितना अधिक आप इन पर ध्यान केंद्रित करेंगे, उतना ही आपको इस बात का एहसास होगा कि किस प्रकार तरंग पदार्थ को साधारण दुहराव वाले तरंगों से जटिल रूपों में व्‍यवस्‍थित करने लगती हैं.

जल एक अत्‍यंत रहस्‍यात्‍मक द्रव्‍य है. यह अत्‍यंत संवेदनशील है. अर्थात्, यह कंपन प्राप्‍त कर सकता है और उसे रोक कर रख सकता है. अपनी अत्‍याधिक गुंजायमान क्षमता तथा संवेदनशीलता एवं गूंजने के लिए आंतरिक तत्‍परता के कारण जल सभी प्रकार की ध्‍वनि तरंगों के प्रति तत्‍काल प्रतिक्रिया देता है. प्रदोलित जल तथा पृथ्‍वी से अधिकांश पौधों तथा पशुओं के समूह का निर्माण होता है.

कॉर्न स्टार्च कम्पन के साथ
यह देखना सरल है कि जल में किस प्रकार साधारण प्रदोलन, पहचानने योग्‍य प्राकृतिक प्रतिकृतियों को सृजित कर सकता है, लेकिन जैसे ही हम उसमें ठोस पदार्थ मिलाते हैं और उसके आयाम को बढ़ा देते हैं तो वस्‍तुएं और भी दिलचस्‍प हो जाती हैं. पानी में कार्नस्‍टार्च (मक्‍की की मांड) मिलाने से हमें और मिश्रित तत्‍व हासिल होते हैं. कदाचित जीवन के सिद्धांतों को भी महसूस किया जा सकता है, चूंकि कंपनों से कार्नस्‍टार्च चलते- फि‍रते जीव में परिवर्तित हो जाती है.
कबाला या यहूदी रहस्‍यवाद में ईश्‍वर के दिव्‍य नाम का उल्‍लेख है. वह नाम जिसे उच्‍चारित नहीं किया जा सकता. इसे इसलिए नहीं बोला जा सकता, क्यूंकि यह ऐसा कंपन है जो सर्वत्र है. यह सभी शब्‍दों और सभी पदार्थों में हैं. पवित्र शब्‍द ही सब कुछ है. चतुष्‍फलक सर्वाधिक सामान्य आकार है, जो तीन आयामों में अस्तित्‍व में है. कुछ में भौतिक वास्‍तविकता के लिए कम से कम चार बिंदु होने चाहिए. त्रिकोणीय संरचना प्रकृति की केवल स्‍वनिर्धारित प्रतिकृति है. पूर्व-विधान में शब्‍द `चतुर्वर्णी` ईश्‍वर के कुछेक प्रकटीकरण के लिए प्राय: प्रयुक्‍त किया जाता है. इसे तब प्रयोग किया गया था, जब ईश्‍वर के शब्‍द या ईश्‍वर, लोगो या प्रारंभिक शब्‍द के विशेष नाम से बात की गई थी. प्राचीन सभ्‍यता जानती है कि ब्रह्माण्‍ड की आधारभूत संरचना चतुष्फलक आकार की थी. इस आकार में प्रकृति साम्‍य, शिव के लिए आधारभूत प्रमाण प्रदर्शित करती है. हालांकि इसमें परिवर्तन के लिए आधारभूत प्रमाणशक्ति भी है.

क्या हम अपने सपनों को रिकॉर्ड कर सकते हैं? Can We Record Our Dreams?
बाइबल में जॉन सिद्धांत में सामान्‍यतया`आरंभ पाठ में प्रयुक्‍त शब्‍द `लोगो` था. ईसा पूर्व लगभग 500वें वर्ष में विद्यमान ग्रीक दार्शनिक हरक्‍लीटस ने `लोगो` का उल्‍लेख कुछ आधारभूत अज्ञात के रूप में किया. सभी पुनरावृति, पद्धति और स्वरूपों का उद्भव. हरक्‍लीटस के उपदेशों का अनुसरण करने वाले निर्लिप्त दार्शनिकों ने ब्रह्माण्‍ड में व्‍याप्‍त दिव्‍य जीवंत सिद्धांत के साथ इस शब्‍द का पता लगाया. सूफीवाद में `लोगो` सर्वत्र है और सभी वस्‍तुओं में है. यह वह तत्व है जिसमें अव्‍यक्‍त, व्‍यक्‍त हो जाता है.
हिन्‍दू परंपरा में शिव नटराज का शाब्दिक अर्थ है `नृत्‍य सम्राट`. संपूर्ण ब्रह्माण्‍ड शिव की धुन पर नृत्‍य करता है. सभी कुछ स्‍पंदन से ही ओतप्रोत होता है. केवल जब तक शिव नृत्‍य कर रहे हैं तभी तक संसार विकसित और परिवर्तित हो सकता है, अन्‍यथा सब कुछ समाप्‍त होकर शून्‍य हो जाएगा. यद्यपि शिव हमारी चेतना का साक्ष्‍य है, शक्ति संसार का सार है. यद्यपि शिव ध्‍यानमग्न हैं, शक्ति उन्‍हें संचालित करने का प्रयत्‍न करती है, जिससे उन्‍हें नृत्‍य में उतारा जा सके. यिन एवं यांग की तरह नर्तक तथा नृत्‍य का अस्तित्‍व एक है. `लोगो़` का अर्थ है अनावृत सत्‍य. जो `लोगो़` को जानता है, वही सत्‍य को जानता है. छिपाव की कई परतें आकाश के रूप में मानवीय संसार में अस्तित्‍व में हैं, जिससे स्‍वयं के स्रोत को छिपाते हुए वह जटिल संरचनाओं के भंवर में फंस जाता है. लुकाछिपी के दिव्‍य खेल की तरह हम हजारों वर्षों से छिपते चले आ रहे हैं और खेल को पूरी तरह से भूल गए हैं. हम भूल गए हैं कि कोई ऐसी चीज है जिसकी खोज की जानी है.

बौद्धधर्म में प्रत्‍येक को अपने `लोगो़` को सीधे महसूस करना, अर्थात् ध्‍यान के माध्‍यम से अपने भीतर परिवर्तन या नश्‍वरता के क्षेत्र का पता लगाना सिखाया जाता है. जब आप अपना आंतरिक संसार देखते हैं तो आप सूक्ष्‍म संवेदनाओं और ऊर्जा को देखते हैं और मस्तिष्‍क अधिकाधिक कुशाग्र व आत्‍मकेन्द्रित होने लगता है. `अणिका` के प्रत्‍यक्ष अनुभव या संवेदन के आधारभूत स्‍तर पर नश्‍वरता के माध्‍यम से व्‍यक्ति मोह से मुक्‍त हो जाता है. एक बार हम अनुभव कर लेते हैं कि एक ही क्षेत्र है जो सभी धर्मों का सामान्‍य रास्‍ता है, तो हम किस प्रकार कह सकते हैं `मेरा धर्म` या `यह मेरा मौलिक ओम् है`, `मेरा क्‍वाण्‍टम क्षेत्र है`? हमारे संसार में वास्‍तविक संकट सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक नहीं हैं. हमारे संकट चेतना के संकट हैं, अपने वास्‍तविक स्‍वरूप को प्रत्‍यक्ष अनुभव कर पाने की असमर्थता. प्रत्‍येक वस्‍तु और प्रत्‍येक व्‍यक्ति में इस प्रकृति को पहचानने की असमर्थता. बौद्ध परंपरा में, `बोधिसत्व` जागृत बुद्ध प्रकृति का व्‍यक्ति है. ब्रह्माण्‍ड में बोधिसत्व हर प्राणी को जागृत करने में सहायता करता है, यह अनुभव करते हुए कि चेतना केवल एक ही है. किसी के वास्‍तविक स्‍वरूप को जागृत करने के लिए व्‍यक्ति को सभी को जागृत करना चाहिए.
“ विश्‍व में असंख्‍य सचेतन प्राणी हैं, मैं उनकी जागृति में सहायता करना चाहता हूं.
मेरी अपूर्णताएं असंख्‍य हैं, मैं उन पर विजय पाना चाहता हूँ.
धर्म अज्ञात है, मैं इसे जानना चाहता हूं.
जागृति का मार्ग अप्राप्‍य है, मैं इसे पाना चाहता हूं. “

SANT RAVIDAS : Hari in everything, everything in Hari

For him who knows Hari and the sense of self, no other testimony is needed: the knower is absorbed. हरि सब में व्याप्त है, सब हरि में...

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चेतावनी : मै किसी धर्म, पार्टी, सम्प्रदाय का विरोध या सहयोग करने नही आया हूँ | मै सिर्फ १५,००० बर्ष की सच्ची इतिहास अध्ययन के बाद रखता हूँ | हिन्दू एक ही पूर्वज के संतान है | भविस्य पुराण के अनुसार राजा भोज ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए कार्य का बंटवारा किया था | जिसके अनुसार कोई भी अपने योगयता के अनुसार कार्य कर सकता था | कोई भी कोई कार्य चुन सकता था | पूजा करना , सैनिक बनना,खाना बनाना,व्यापार करना ,पशु पालना, खेती करना इत्यादि | ये कालांतर में जाति का रूप लेता गया | हिन्दू के बहुजन समाज (पिछड़ा, अति पिछड़ा, अन्य पिछड़ा, दलित और महादलित ) को सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष कर रहा हूँ | योगयता और मेहनत ही उन्नति का साधन है | एक कटु सत्य : यह हैं की मध्य काल में जब वेद विद्या का लोप होने लगा था, उस काल में ब्राह्मण व्यक्ति अपने गुणों से नहीं अपितु अपने जन्म से समझा जाने लगा था, उस काल में जब शुद्र को नीचा समझा जाने लगा था, उस काल में जब नारी को नरक का द्वार समझा जाने लगा था, उस काल में मनु स्मृति में भी वेद विरोधी और जातिवाद का पोषण करने वाले श्लोकों को मिला दिया गया था,उस काल में वाल्मीकि रामायण में भी अशुद्ध पाठ को मिला दिया गया था जिसका नाम उत्तर कांड हैं। जो धर्म सृष्टि के आरम्भ के पहले और प्रलय के बाद भी रहे उसे सनातन धर्म कहते है | सनातन धर्म का आदि और अंत नही है | नया सवेरा