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क्या ॐ शब्द से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ

धर्म,भगवान और ब्रह्माण्ड का सही ज्ञान
कम्पन, फ्रैक्‍टल, बुद्ध, ब्रह्माण्ड, भगवान, मन  जब कुछ भी नहीं था, यानी की सिर्फ विलक्षणता (Singularity) थी….
क्या ॐ शब्द से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ

कहा जाता हैं तब एक प्रारम्भिक शब्द (ध्वनि) उत्पन्न हुआ. जो एक महाविस्फोट था. बिग बेंग. कहा जाता हैं की हमारा यह भौतिक ब्रह्माण्ड इस प्रारंभिक बिंदु से ही अस्तित्व मैं आया. एक परमाणु से भी अरबो गुना छोटा यह बिंदु क्यों और कैसे अस्तित्व मैं आया यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ हैं. इस बिन्दु से अचानक ब्रह्माण्ड का अनंत रूप से विस्तार होने लगा. लेकिन कोई नहीं जानता कैसे. कोई चीज़ भले ही कितनी भी रहस्यमय और अकल्नीय हो, इंसानों को लगता हैं की वे उसे जान चुके हैं. भौतिकशास्त्रीयों का मानना हैं की ब्रह्माण्ड मैं केवल 4% जितना ही परमाणु पदार्थ हैं, 23% अविज्ञ पदार्थ और 73% निष्क्रिय उर्जा हैं. यह उर्जा जिसे हम खाली जगह या empty space के रूप मैं जानते हैं. यह एक अद्रश्य सिस्टम हैं जो ब्रह्माण्ड मैं सभी चीजों को एकसाथ जोड़कर संचालित होता हैं.
प्राचीन वेदों के अनुसार आवाज (voice) ही सबकुछ हैं. आवाज ब्रह्म हैं. हमारा ब्रह्माण्ड कम्पित हो रहा हैं. और कम्पित हो रहा यह क्षेत्र सारे मूल आध्यात्मिक अनुभवों और वैज्ञानिक अन्वेषणों का आधार है. उर्जा का एक क्षेत्र जिसे बुद्धिमान पुरुषों, योगियों और संतोने अपने भीतर खोजा और इसे महसूस किया हैं. जिसे हमारे समस्त इतिहास मैं ब्रह्मांडीय संगीत, आकाश, ओम और बिग बेंग जैसे नाम दीए गए हैं. सबसे ज्यादा चर्चास्पद नाम रहा हैं : “ भगवान ”. इसका उल्लेख दुनिया के सभी धर्मो मैं हैं और यहीं हमारी अन्दर की और बाहर की दुनिया को जोड़ता हैं.

हमारे ब्रह्माण्ड की आज के समय में जो व्याख्या की जाती हैं वह प्राचीन काल में अलग अलग धर्मो में की गयी व्याख्या से ज्यादा अलग नहीं हैं. अमेरिका के 20वी सदी के महँ वैज्ञानिक निकोला टेस्ला, जिन्होंने प्रत्यावर्ती विद्युत धारा की खोज की थी, उन्हें प्राचीन वैदिक परंपराओं में ज्यादा रूचि थी. निकोला टेस्ला पूर्वी संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति दोनों के माध्यम से विज्ञान को समजना चाहते थे. अन्य वैज्ञानिको की तरह टेस्लाने ब्रह्माण्ड के रहस्यों को गहरे से देखने के साथ साथ अपने भीतर की गहराई में भी झाँका. किसी योगी की तरह स्वर्गिक अनुभव को वर्णित करते हुए आकाश (Aakasha) शब्द का प्रयोग किया. जो सभी चीजों में व्याप्त हैं. इसके लिए निकोला टेस्लाने भारत के स्वामी विवेकानंद के साथ मिलकर इस विषय का अभ्यास किया. स्वामी विवेक नन्द, जिन्होंने भारत की प्राचीन वैदिक शिक्षा और संस्कृति को पश्चिमी देशों तक पहुँचाया था. वैदिक शिक्षा के अनुसार आकाश खुद शून्य हैं, जिसमे अन्य सारे तत्व भरे हुए हैं. यह तत्व इस शून्य में कम्पित होते हुए उपस्थित रहते हैं. यह एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं. आकाश, अन्तरिक्ष या खाली जगह यिन हैं और इसके अंदर का पदार्थ यांग हैं.
फ्रैक्‍टल (Fractal)
कंप्यूटरों मैं लगातार हो रही प्रगति ने 1980 के दशक के बाद से समग्र ब्रह्माण्ड की प्रकृति के गणितीय ढांचे की गणितीय कल्‍पना कर उसे वास्तविक रूप में पहचानने का हमें अवसर दिया हैं. “ फ्रैक्‍टल (Fractal) “ अर्थात अंश (भाग) शब्‍द का गठन सन 1980 में गणितज्ञ बेनॉयट मेंडेलब्रॉट ने किया था. उन्‍होंने जब कुछ गणितीय समीकरणों का अध्‍ययन करने पर पाया कि एक सीमित दायरे में दोहराने पर यह फ्रैक्‍टल्स अंतहीन गणितीय अथवा ज्‍योमितीय रूप में बदलती हैं. वे सीमित हैं लेकिन साथ ही अनंत भी. एक अंश एक स्थूल ज्‍यामितीय आकार होता है, जिसे अनेक हिस्‍सों में वि‍भाजित किया जा सकता है, ऐसे विभाजित किए हुए हिस्सों के अनंत हिस्से हो सकते हैं और उनके भी अनत हिस्से. जिनमें से प्रत्‍येक लगभग संपूर्ण आकार का संक्षिप्त प्रतिरूप है. इस गुण को “ समरूपता “ कहा जाता है. मेंडेलब्राट के इस “ अंश “ की छाप को ईश्‍वर के अंगूठे की छाप कहा जाता हैं. यदि आप मेंडेलब्राट की इस फ्रैक्‍टल की आकृति को एक विशिष्ट तरीक़े से घुमाएँ तो यह किसी हिन्‍दू देवता अथवा भगवान बुद्ध के जैसा दिखाई देता हैं जिसको “ बुद्धब्राट “ आकार` नाम से भी जाना जाता हैं.
अगर आप प्राचीन स्थापत्यकला को ध्यान से देखेगे तो आप पाएंगे कि प्राचीन मनुष्य जातियां काफी लंबे समय से उनकी सौंदर्य और पवित्रता को फ़्रैक्टल पैटर्न के साथ जोड़ते आए हैं. अत्‍यंत जटिल, लेकिन फि‍र भी कण-कण में उसकी पूर्णता का बीज होता है. फ्रैक्‍टल्‍स ने ब्रह्माण्ड और इसकी संचालन प्रक्रिया पर बहुत सारे गणितज्ञों का दृष्टिकोण बदला है. आवर्धन के हर एक नए स्‍तर के साथ, मूल से भिन्‍नता उजागर होती हैं. जब हम फ्रैक्टल के एक स्‍तर से दूसरे स्‍तर पर पारगमन करते हैं तो ब्रह्माण्डीय सर्पिल गति में सतत परिवर्धन एवं रूपांतरण घटित होता है. दिक्काल के सांचे में सन्निहित बुद्धिमता. फ्रैक्‍टल्‍स यानी सहज रूप से अस्तव्यस्त किन्तु शब्‍द एवं नियम से भरपूर हैं.


मंगल ग्रह पर पानी

हमारे मस्तिष्‍क किसी आकार को जब पहचानकर उसको परिभाषित करता हैं, तब हम उस पर इस तरह ध्यान केन्द्रित करते हैं जैसे वह कोई वस्तु हो. हम हमेशां आकारों को हमारे द्वारा देखी गई सुंदरता के अनुरूप ढूंढते हैं, लेकिन अपने मस्तिष्क में इन आकारों को बनाए रखने के क्रम में हमें शेष फ्रैक्‍टल्‍स को हटा देने चाहिए. फ्रैक्‍टल्‍स को चेतनाओं में समाविष्‍ट करने का मतलब हैं फ्रैक्‍टल्‍स का संचालन सीमित करना है. ब्रह्माण्‍ड में मौजूद सारी ऊर्जा तटस्‍थ, शाश्‍वत और आयामहीन है. हमारी अपनी रचनात्‍मकता और आकारों को पहचानने की क्षमता सूक्ष्‍म जगत एवं ब्रह्माण्‍ड के बीच की कड़ी है. यह लहरों और ठोस वस्‍तुओं का शाश्वत जगत हैं. चिंतन की स्‍वभाविक सीमाओं में अवलोकन करना एक सृजनात्मकता है क्योंकि हम वर्गीकरण के द्वारा नाम देकर, किसी भी चीज़ के ठोसपन का भ्रम पैदा करते हैं.
दार्शनिक कीर्केगार्ड ने कहा था की ” यदि आप मेरा नाम रखते हैं तो आप मुझे नकारते हैं. मेरा नाम रखकर, वर्गीकरण कर, आप उन सभी अन्‍य चीजों को नकार देते हैं जिनकी मुझमें होने की संभावना हो सकती है. आप किसी चीज़ या कण को उसका एक अलग नाम देकर उसको एक वस्‍तु के रूप में व्‍याख्‍यायित कर देते हैं, आप उसके अस्तित्‍व को परिभाषित कर उसका सर्जन कर देते हैं. ” सर्जनात्‍मकता हमारी सर्वोच्‍च प्रकृति है. क्योंकि वस्‍तुओं के सर्जन से ऐसी स्थिति बनती है जब चीजों में ठोसपन का भ्रम हो.
आल्बर्ट आइन्‍सटीन ऐसे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने यह जाना कि जिस अंतरिक्ष को हम शून्‍य मानते हैं, वास्तव में वह ऐसा है नहीं, बल्कि उसकी कई विशेषताएं हैं. अंतरिक्ष की प्रकृति अनंत आंतरिक ऊर्जा से भरपूर है. भौतिकशास्त्री रिचर्ड फैनमेन के मुताबिक, ” अंतरिक्ष के अकेले क्‍यूबिक मीटर में इतनी ऊर्जा है कि विश्‍व के सभी महासागर उबल सकें. ” अधिकतम ऊर्जा स्थिर और शांत हैं. बुद्ध इसे “ कल्प “ कहते थे. कल्प किसी सूक्ष्‍म कणों अथवा तरंगिकाओं की तरह हैं जो प्रति सेकंड खरबों बार उत्‍पन्‍न व लुप्‍त होती हैं. यह किसी स्वलिखित फ़िल्म कैमरे में तेज गति से चलती गतिशील फ़्रेमों की शृंखला द्वारा सातत्य का भ्रम पैदा करने के समान है. यह भ्रम केवल चेतना के रूरी तरह से स्थिर होने पर समझा जा सकता है. क्योंकि यह चेतना ही है जो भ्रम को संचालित करती है.

दुनिया की ज्यादातर प्राचीन संस्कृतियों में यह समजा गया हैं की ब्रह्माण्ड मैं सबकुछ कंपायमान हैं. नाद ब्रह्म हैं. ब्रह्माण्‍ड एक ध्‍वनि है. “ नाद ब्रह्म ” – नाद यानी ध्वनि और ब्रह्म यानी इश्वर. कलाकार और कला अभिन्‍न हैं. प्राचीन योगियों ने यह माना की चेतना का मूल एक आधार होता है. वर्तमान और भविष्‍य की सभी जानकारियां तथा अनुभव अभी अस्तित्‍व में हैं और सदा रहते हैं. यह वही क्षेत्र है जहाँ से सभी चीज़े अस्तित्व में आती हैं. अणुओं और परमाणुओं से लेकर आकाशगंगा और पूरे ब्रह्माण्ड के जीवन चक्र तक. आप इसे समग्रता में कभी नहीं देख पाते, क्‍योंकि यह कंपन परत-दर-परत पर बना है और निरंतर परिवर्तनशील है.

लेकिन आपका जब विचारशील मस्तिष्‍क शांत होता हैं, तब आप यथार्थ को वास्‍तविक रूप में देख सकते हैं. सभी अवस्‍थाएं एक साथ. वृक्ष, आकाश, पृथ्‍वी, वर्षा तथा सितारे एकसाथ. जीवन और मृत्‍यु हमारी अपनी या किसी अन्‍य की, पृथक नहीं हैं. ठीक वैसे ही जैसे पर्वत और वादियां अभिन्‍न हैं. अमेरिका की आदिवासी परंपराओं में यह कहा गया है कि प्रत्‍येक वस्‍तु में जीव है जिसे अन्य तरीक़े से कहे तो प्रत्‍येक वस्‍तु स्‍पंदनशील स्रोत से संबद्ध है. सर्वत्र एक चेतना, एक व्‍यापकता, एक ऊर्जा व्याप्त है. यह व्याप्ति आपके आसपास नहीं, बल्कि यह आपके माध्‍यम से घटित हो रही है और आपके वास्‍तविक स्वरूप के अनुसार घटित हो रही है. आप नेत्र हैं जिनके माध्‍यम से सृजक स्‍वयं को देखता है. स्‍वप्न से बाहर आने पर आप महसूस करते हैं कि स्‍वप्न में सब कुछ आप ही थे. आप इसे सृजित कर रहे थे. प्रत्‍येक व्‍यक्ति और प्रत्‍येक वस्‍तु आप हैं. प्रत्‍येक नेत्र की चेतन दृष्टि, प्रत्‍येक चट्टान के नीचे छिपे प्रत्‍येक अणु के भीतर तक देखती है. जिस द्रष्टि से हम हम ब्रह्माण्ड या प्रारंभिक सिद्धांत का क्षेत्र देखते हैं और वह दृष्टि जिससे क्षेत्र हमें देखता है, दोनों एक ही है.


समय यात्रा Time Travel
प्रत्‍येक पदार्थ कंपन से भरपूर है, किन्तु किसी स्थिर चीज़ को देखकर ऐसा बिलकुल नहीं लगता हैं क्योंकि कोई चीज कंपित हो रही हैं. ऐसा लगता लगता है जैसे मानो कोई अदृश्‍य नर्तक ब्रह्मांड की नृत्‍य-नाटिका में छिप कर छाया नृत्य कर रहा हैं. अन्‍य सभी नर्तक हमेशा इस छिपे नर्तक के आसपास नृत्‍य करते हैं. लेकिन हमने नृत्‍य की नृत्‍यकला देखी लेकिन अब तक उस नर्तक को नहीं देख सके.

जर्मन लेखक और विद्वान वुल्‍फगेंग वॉन गोयथे ने कहा की, ” तरंग आदिकालीन तथ्‍य है जिससे विश्‍व उत्पन्न हुआ “. सिमेटिक दृश्‍य ध्‍वनि का अध्‍ययन है. सिमेटिक शब्‍द ग्रीक के मूल शब्‍द “ साईमा “ से बना हैं, जिसका अर्थ है – तरंग या कंपन. तरंगीय तथ्य का गंभीरता से अध्‍ययन करने वालों में प्रथम पश्चिमी वैज्ञानिक अर्नस्‍ट श्लाड्नी थे. वह अठारहवीं शताब्‍दी का एक जर्मन संगीतज्ञ एवं भौतिक विज्ञानी था. श्लाड्नी ने खोज की कि धातु की प्‍लेटों पर रेत फैला कर वायलन गज से जब प्‍लेटों को डुलाया गया, तो रेत स्‍वत: प्रतिकृतियों में व्‍यवस्थित हो गई. उत्‍पादित कंपन के आधार पर भिन्‍न–भिन्‍न ज्‍यामितिक स्वरूप दृष्टिगोचर हुए. श्लाड्नी ने इन रूपों की समूची तालिका रिकार्ड की, जिन्‍हें श्लाड्नी आकृतियों के रूप में उल्लिखित किया जाता है. इनमें कई प्रतिकृतियों को समग्र प्राकृतिक विश्‍व में देखा जा सकता है. जैसे कछुए या तेंदुए की चित्तियों की प्रतिकृतियों के निशान. श्लाड्नी की प्रतिकृतियों या साइमेटिक प्रतिकृतियों का अध्‍ययन एक गोपनीय विधि है जिसके माध्यम से उन्नत गिटार, वॉयलिन और अन्‍य वाद्ययंत्रों के निर्माता वाद्ययंत्रों की ध्‍वनि गुणवत्‍ता का निर्धारण करते हैं.

हैंस जेनी ने वर्ष 1960 में श्लाड्नी का कार्य आगे बढ़ाया और ध्‍वनि नैरंतर्य को विकसित करने के लिए विभिन्‍न द्रव्य एवं इलेक्‍ट्रॉनिक प्रवर्धकों का प्रयोग किया एवं `सिमेटिक्‍स` (तरंग) ध्‍वनि का सृजन किया. यदि आप जल में सामान्‍य तरंगों की ओर दौड़ते हैं तो आप जल में प्रतिकृतियां देख सकते हैं. तरंग की आवृत्ति के आधार पर विभिन्‍न तरंगित प्रतिकृतिया दृष्टिगोचर होंगी. आवृत्ति के बढ़ने पर प्रतिकृति जटिल होती जाएगी. इन स्वरूपों की पुनरावृति होगी, लेकिन ये बेतरतीब नहीं होंगी. जितना अधिक आप इन पर ध्यान केंद्रित करेंगे, उतना ही आपको इस बात का एहसास होगा कि किस प्रकार तरंग पदार्थ को साधारण दुहराव वाले तरंगों से जटिल रूपों में व्‍यवस्‍थित करने लगती हैं.

जल एक अत्‍यंत रहस्‍यात्‍मक द्रव्‍य है. यह अत्‍यंत संवेदनशील है. अर्थात्, यह कंपन प्राप्‍त कर सकता है और उसे रोक कर रख सकता है. अपनी अत्‍याधिक गुंजायमान क्षमता तथा संवेदनशीलता एवं गूंजने के लिए आंतरिक तत्‍परता के कारण जल सभी प्रकार की ध्‍वनि तरंगों के प्रति तत्‍काल प्रतिक्रिया देता है. प्रदोलित जल तथा पृथ्‍वी से अधिकांश पौधों तथा पशुओं के समूह का निर्माण होता है.

कॉर्न स्टार्च कम्पन के साथ
यह देखना सरल है कि जल में किस प्रकार साधारण प्रदोलन, पहचानने योग्‍य प्राकृतिक प्रतिकृतियों को सृजित कर सकता है, लेकिन जैसे ही हम उसमें ठोस पदार्थ मिलाते हैं और उसके आयाम को बढ़ा देते हैं तो वस्‍तुएं और भी दिलचस्‍प हो जाती हैं. पानी में कार्नस्‍टार्च (मक्‍की की मांड) मिलाने से हमें और मिश्रित तत्‍व हासिल होते हैं. कदाचित जीवन के सिद्धांतों को भी महसूस किया जा सकता है, चूंकि कंपनों से कार्नस्‍टार्च चलते- फि‍रते जीव में परिवर्तित हो जाती है.
कबाला या यहूदी रहस्‍यवाद में ईश्‍वर के दिव्‍य नाम का उल्‍लेख है. वह नाम जिसे उच्‍चारित नहीं किया जा सकता. इसे इसलिए नहीं बोला जा सकता, क्यूंकि यह ऐसा कंपन है जो सर्वत्र है. यह सभी शब्‍दों और सभी पदार्थों में हैं. पवित्र शब्‍द ही सब कुछ है. चतुष्‍फलक सर्वाधिक सामान्य आकार है, जो तीन आयामों में अस्तित्‍व में है. कुछ में भौतिक वास्‍तविकता के लिए कम से कम चार बिंदु होने चाहिए. त्रिकोणीय संरचना प्रकृति की केवल स्‍वनिर्धारित प्रतिकृति है. पूर्व-विधान में शब्‍द `चतुर्वर्णी` ईश्‍वर के कुछेक प्रकटीकरण के लिए प्राय: प्रयुक्‍त किया जाता है. इसे तब प्रयोग किया गया था, जब ईश्‍वर के शब्‍द या ईश्‍वर, लोगो या प्रारंभिक शब्‍द के विशेष नाम से बात की गई थी. प्राचीन सभ्‍यता जानती है कि ब्रह्माण्‍ड की आधारभूत संरचना चतुष्फलक आकार की थी. इस आकार में प्रकृति साम्‍य, शिव के लिए आधारभूत प्रमाण प्रदर्शित करती है. हालांकि इसमें परिवर्तन के लिए आधारभूत प्रमाणशक्ति भी है.

क्या हम अपने सपनों को रिकॉर्ड कर सकते हैं? Can We Record Our Dreams?
बाइबल में जॉन सिद्धांत में सामान्‍यतया`आरंभ पाठ में प्रयुक्‍त शब्‍द `लोगो` था. ईसा पूर्व लगभग 500वें वर्ष में विद्यमान ग्रीक दार्शनिक हरक्‍लीटस ने `लोगो` का उल्‍लेख कुछ आधारभूत अज्ञात के रूप में किया. सभी पुनरावृति, पद्धति और स्वरूपों का उद्भव. हरक्‍लीटस के उपदेशों का अनुसरण करने वाले निर्लिप्त दार्शनिकों ने ब्रह्माण्‍ड में व्‍याप्‍त दिव्‍य जीवंत सिद्धांत के साथ इस शब्‍द का पता लगाया. सूफीवाद में `लोगो` सर्वत्र है और सभी वस्‍तुओं में है. यह वह तत्व है जिसमें अव्‍यक्‍त, व्‍यक्‍त हो जाता है.
हिन्‍दू परंपरा में शिव नटराज का शाब्दिक अर्थ है `नृत्‍य सम्राट`. संपूर्ण ब्रह्माण्‍ड शिव की धुन पर नृत्‍य करता है. सभी कुछ स्‍पंदन से ही ओतप्रोत होता है. केवल जब तक शिव नृत्‍य कर रहे हैं तभी तक संसार विकसित और परिवर्तित हो सकता है, अन्‍यथा सब कुछ समाप्‍त होकर शून्‍य हो जाएगा. यद्यपि शिव हमारी चेतना का साक्ष्‍य है, शक्ति संसार का सार है. यद्यपि शिव ध्‍यानमग्न हैं, शक्ति उन्‍हें संचालित करने का प्रयत्‍न करती है, जिससे उन्‍हें नृत्‍य में उतारा जा सके. यिन एवं यांग की तरह नर्तक तथा नृत्‍य का अस्तित्‍व एक है. `लोगो़` का अर्थ है अनावृत सत्‍य. जो `लोगो़` को जानता है, वही सत्‍य को जानता है. छिपाव की कई परतें आकाश के रूप में मानवीय संसार में अस्तित्‍व में हैं, जिससे स्‍वयं के स्रोत को छिपाते हुए वह जटिल संरचनाओं के भंवर में फंस जाता है. लुकाछिपी के दिव्‍य खेल की तरह हम हजारों वर्षों से छिपते चले आ रहे हैं और खेल को पूरी तरह से भूल गए हैं. हम भूल गए हैं कि कोई ऐसी चीज है जिसकी खोज की जानी है.

बौद्धधर्म में प्रत्‍येक को अपने `लोगो़` को सीधे महसूस करना, अर्थात् ध्‍यान के माध्‍यम से अपने भीतर परिवर्तन या नश्‍वरता के क्षेत्र का पता लगाना सिखाया जाता है. जब आप अपना आंतरिक संसार देखते हैं तो आप सूक्ष्‍म संवेदनाओं और ऊर्जा को देखते हैं और मस्तिष्‍क अधिकाधिक कुशाग्र व आत्‍मकेन्द्रित होने लगता है. `अणिका` के प्रत्‍यक्ष अनुभव या संवेदन के आधारभूत स्‍तर पर नश्‍वरता के माध्‍यम से व्‍यक्ति मोह से मुक्‍त हो जाता है. एक बार हम अनुभव कर लेते हैं कि एक ही क्षेत्र है जो सभी धर्मों का सामान्‍य रास्‍ता है, तो हम किस प्रकार कह सकते हैं `मेरा धर्म` या `यह मेरा मौलिक ओम् है`, `मेरा क्‍वाण्‍टम क्षेत्र है`? हमारे संसार में वास्‍तविक संकट सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक नहीं हैं. हमारे संकट चेतना के संकट हैं, अपने वास्‍तविक स्‍वरूप को प्रत्‍यक्ष अनुभव कर पाने की असमर्थता. प्रत्‍येक वस्‍तु और प्रत्‍येक व्‍यक्ति में इस प्रकृति को पहचानने की असमर्थता. बौद्ध परंपरा में, `बोधिसत्व` जागृत बुद्ध प्रकृति का व्‍यक्ति है. ब्रह्माण्‍ड में बोधिसत्व हर प्राणी को जागृत करने में सहायता करता है, यह अनुभव करते हुए कि चेतना केवल एक ही है. किसी के वास्‍तविक स्‍वरूप को जागृत करने के लिए व्‍यक्ति को सभी को जागृत करना चाहिए.
“ विश्‍व में असंख्‍य सचेतन प्राणी हैं, मैं उनकी जागृति में सहायता करना चाहता हूं.
मेरी अपूर्णताएं असंख्‍य हैं, मैं उन पर विजय पाना चाहता हूँ.
धर्म अज्ञात है, मैं इसे जानना चाहता हूं.
जागृति का मार्ग अप्राप्‍य है, मैं इसे पाना चाहता हूं. “

अधर्मी के दश सवाल के जवाब


मै हिन्दू धर्म मानने वालों से बस यह पूछना चाहूँगा

जिस धर्म में पिता अपनी पुत्री से सौ वर्ष से अधिक निरन्तर बलात्कार करे फिर भी भगवान ब्रहमा कहलाये !
उत्तर :
भगवान् ब्रह्मा ने कल्पना से ही संसार बनाया है | ब्रह्मा ने कल्पना से ही सबको पैदा किया है न की सम्बन्ध से इन्होने मानस पुत्र को जन्म दिया है | अतः ब्रह्मा की शक्ति माँ सरस्वती माँ गायत्री और गणेश जी है जिनके सहायता से वो विधान लिखते है | भगवन विष्णु की शक्ति लक्ष्मी है | जो पालन पोषण में सहायता करती है | महदेव की शक्ति कालि है जो शिव को प्रलय संहार में सहायता करती है |
दुर्गा सप्तशती में रहस्य में बताया गया है | माँ सरस्वती की उत्पत्ति माँ महाकाली ने की है |




२ - जिस धर्म में कोइ जो अपनी स्त्री को जुआ में दाव पर लगा कर हार जाये वो फिर भीधर्मराज कहलाये !
उत्तर :जुआ जो समाज में बुराई थी | उसे मिटने के लिए रास्ता बताया है |  धर्मराज युधिष्ठिर ने परिणाम बताया है | धर्म अधर्म सिखाया है |

३ - जिस धर्म में बेटा अपनी निर्दोष
मां को फ़र्सा से हत्या
कर दे वो तुच्छ भगवान का अवतार और
परशुराम कहाये !
उत्तर : पिता का आज्ञा पालन सर्वोपरि बताया है | माँ को फिर जीवित किया गया है | भगवन राम ने भी पिता का आज्ञा माना | 
उत्तर : 
ताड़ना एक (अवधी - संस्कृत) शब्द है । जिसका हिंदी में अर्थ होता है । अनुशासन, शिष्टाचार, मर्यादा (Discipline) या शिक्षा

संस्कृत का एक श्लोक पढ़े :
लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥
अर्थ- पाँच वर्ष की अवस्था तक पुत्र को लाड़ करना चाहिए, दस वर्ष की अवस्था तक (उसी की भलाई के लिए) उसे ताड़ना (अनुशासन , Discipline , मर्यादा , शिक्षा ) देना चाहिए और उसके सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त कर लेने पर उससे मित्रवत व्यहार करना चाहिए.
Till the son is five years old one should pamper him. When he crosses five till he becomes 10 he should be spanked. (Tadayet means to spank) in reality those are the years when one needs to discipline him. Line -2 However, when he turns 16, he should be treated like a friend. ( Means he should feel that he is grown up and his opinion matters, which can happen when he is treated like a friend.)

ताड़ना = DISCIPLINE = मर्यादा = अनुशासन = शिक्षा
अब आप श्री राम चरितमानस के पूरी दोहा को पढ़े आपके सामने सत्य खुद ही समझ में आएगा ।
दोहा ।
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर शूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
अर्थ : समुद्र प्रार्थना करते है की आपने हमें शिक्षा (अनुशासन) देकर अच्छा किया । ये आपने मर्यादा (कर्तव्य ) को फिर से स्थापित किया है ।
ढोल गंवार शुद्र पशु और नारी सारे ताड़ना (ताडयेत् , मर्यादा, अनुशासन , Discipline, शिक्षा ) के अधिकारी है ।
English :

Shree Ram you have done well to discipline me | This is guidelines which you have defined again.
A Drum, an Illiterate, Poor people (I would not interpret it as Dalit’s), Animals and Women all have the rights to be disciplined.

५ - जिस धर्म में मलभक्छी सूअर को
भगवान का अवतार
कहा जाये किन्तु एक मान उस सूअर से
भी नीच शुद्र
मनुष्यों को समझा जाये ! फिर भी
ऐसा पाखंडी धर्म उसके
दुष्ट अनुयायियों को समझ में न आये !

उत्तर : जड़ चेतन में परमात्मा का वास है | वराह भगवान् ने राक्षस राज  हिरण्याक्ष का वध किया था | 

६ - जिस धर्म में कुत्ता और सूअर चूहाऔर उस पत्थर की पूजा हो जिस पर कुत्ते टांग उठा कर अपन मुत्र त्यागकरते हैं , वो पत्थर पवित्र है किंत शुद्र मानव की मात्रछाया से ये मेरु पर्वत व नित्यानंद केअसंवैधानिक संतान,विदेशी आर्य ,मनुवादी, ब्रहमणवादी .व देश्द्रोही संघी अशुद्ध अपवित्र हो जांय ! और पवित्रहोने के लिये गायका मुत्र पीयें ! फिर भी ऐसा पाखंडी धर्म उसके दुष्ट अनुयायियों को समझ में न आये !

उत्तर : 

औरंगजेब रोज ढाई मन जनेऊ न जला लेता था तब तक उसे नींद नहीं आती थी l
आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं की ढाई मन जनेऊ एक दिन में जलाने से कितने हिन्दुओं को मारा सताया जाता होगा और कितने बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन किया जाता होगा, कितनी ही औरतों का शारीरिक मान मर्दन किया जाता होगा और कितने ही मन्दिरों तथा प्रतिमाओं का विध्वंस किया जाता होगा |वर्तमान के पाकिस्तान ईरान अफगानिस्तान बंग्लादेश जो भारत के अंग थे मुगलो ने अत्याचार कर धर्मपरिवर्तन करवाया था | आततायी औरंगजेब प्रतिदिन शाम में ढाई मन जनेऊ जलाते थे | जनेऊ पहनने पर यातना देते थे | इसलिए उपनयन संस्कार बंद और मैला चमड़ा के कारोबार में ब्राह्मणो वैश्यों क्षत्रियो को लगाया गया जिससे अछूत बने | हमारे वीर पूर्वज हिन्दू ( ब्राह्मण क्षत्रिय वैस्य शूद्र ) अछूत बने लेकिन धर्म नहीं त्यागा |

लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है, शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक | दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं | हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके | लेकिन कुछ विकृत मुग़ल काल से कुछ दिमागों ने इस में जननागों की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली और इस पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया

७ - जिस धर्म में एक बंदर तथाकथित
भगवान होकर
पिर्थवी पर रह्ते भी उस से कइ गुना
बडा सूरज को कोइ
फ़ल समझते हुये निगलने या खाने को
सोचे और वह बंदर
भगवान हनुमान कहाये ! फिर भी ऐसा
पाखंडी धर्म उसके
दुष्ट अनुयायियों को समझ में न आये !

उत्तर : भगवान हनुमान रुद्रावतार है | वो अति सूक्ष्म और और अति विशाल रूप ले सकते है | 

८ - जिस धर्म में दो भगवान विष्णु और
शंकर संभोग करने
लगे और तीसरा भग्वान भी अयप्पा के
रूप में जनम ले फिर
भी ऐसा पाखंडी धर्म उसके दुष्ट
अनुयायियों को समझ में न
आये !

उत्तर : ब्रह्मा ने श्रष्टि की उत्पति कल्पना से की है न की सम्भोग से | 
पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक
इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक
और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ ..नपुंसक का प्रतीकअब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए
और वो खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे



क्या ब्राह्मण ने जाती प्रथा प्रारम्भ किया ?
उत्तर : नहीं
राजा भोज ने हिन्दू को कार्य बांटा था जिसे मुगलो ने चालाकी से जाती प्रथा बना दिया | अंग्रेज , कांग्रेस और वामपंथी बुद्धिजीवी ने जहर घोल कर विषाक्त कर दिया |
क्या आप बता सकते हो की आप के पूर्वज किस जाती से थे शायद नहीं मुग़ल के पहले जाती प्रथा नहीं थी | एक बात तो पक्की है आप के पूर्वज वीर हिन्दू थे कायर नहीं और गुलाम नहीं | अरब वाले सिर्फ कनवर्टेड मुस्लिम को गुलाम मानते है | भारत में बहुत सारे राज्य थे | जिसमे मुग़ल का शासन नहीं था | स्वतंत्र थे | कभी मुग़ल की गुलामी नहीं की | जाती प्रथा के लिए सब जिम्मेवार है | केवल ब्राह्मण नहीं | छुवा छूट सिर्फ ब्राह्मण नह करते थे | सब हिन्दू करते थे | कसाई और गंदगी पेशा के कारन सब छुवा छूत करते थे | मुग़ल ने इनको प्रताड़ित करके चंवर वंशीय को चमड़ा छिलवा कर अपमानित किया | हिन्दू तो चमड़े का इस्तेमाल नहीं करते थे | खड़ाऊं करते थे | मंदिर में आज भी बेल्ट जूता खोल के जाते है |
१० - जिस धर्म में लिग और योनि
पूजी जाये
ऐसे धर्म को मानने वालो पर धिक्कार
है ऐसे धर्म पर थू है।

उत्तर :
लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह ,प्रतीक होता है
जबकी जनर्नेद्रीय को संस्कृत मे शिशिन कहा जाता है
शिवलिंग
शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक
पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक
इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक
और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ ..नपुंसक का प्रतीकअब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए
और वो खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे

मनुष्ययोनि ”पशुयोनी”पेड़-पौधों की योनि”’पत्थरयोनि”
योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है..जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है..कुछ धर्म में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है ..इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते है जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख योनी यानी 84 लाख प्रकार के जन्म है अब तो वैज्ञानिको ने भी मान लिया है कि धरती मे 84 लाख प्रकार के जीव (पेड, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है…
मनुष्य योनी पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है..अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है…

औरंगजेब ने हिन्दुओ का जनेऊ जला कर ब्राह्मण क्षत्रिय से अछूत बनाया

औरंगजेब का अत्याचार की कोई सीमा नही था | उसका अत्याचार दिनों दिन बढ़ता गया | वह रोज ढाई मन जनेऊ न जला लेता था तब तक उसे नींद नहीं आती थी l
औरंगजेब अपने शासन के आखिरी बर्षो में रोज ढाई मन जनेऊ जला कर ब्राह्मण क्षत्रिय को गुलाम बना कर अछूत(मैला चमड़ा) काम करवाता था |
आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं की ढाई मन जनेऊ एक दिन में जलाने से कितने हिन्दुओं को मारा सताया जाता होगा और कितने बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन किया जाता होगा, कितनी ही औरतों का शारीरिक मान मर्दन किया जाता होगा और कितने ही मन्दिरों तथा प्रतिमाओं का विध्वंस किया जाता होगा |वर्तमान के पाकिस्तान ईरान अफगानिस्तान बंग्लादेश जो भारत के अंग थे मुगलो ने अत्याचार कर धर्मपरिवर्तन करवाया था | आततायी औरंगजेब प्रतिदिन शाम में ढाई मन जनेऊ जलाते थे | जनेऊ पहनने पर यातना देते थे | इसलिए उपनयन संस्कार बंद और मैला चमड़ा के कारोबार में ब्राह्मणो वैश्यों क्षत्रियो को लगाया गया जिससे अछूत बने | हमारे वीर पूर्वज हिन्दू ( ब्राह्मण क्षत्रिय वैस्य शूद्र ) अछूत बने लेकिन धर्म नहीं त्यागा |
14वीं और 15वीं शताब्दी में गद्दारों के मिलीभगत के कारण (जैसे आज के ज़माने में सेक्युलर हैं) | कई युद्धों में हार के बाद हिन्दू साधू-संतों की अगुवाई में यह निर्णय लिया गया कि अब प्रमुख साधू-संतों द्वारा व्यक्ति निर्माण का कार्य अपने हाथों में लिए जाए |
और इस पुनीत कार्य हेतु बहुत से संतों ने अपना अपना राष्ट्रीय एवं धार्मिक कर्तव्य निभाते हुए समय-समय पर शूरवीरों का निर्माण किया |
समर्थ गुरु रामदास जी भी इसी श्रेणी में आते हैं जिन्होंने शिवाजी का निर्माण किया |
वहीँ प्राण नाथ महाप्रभु जी ने बुन्देलखण्ड से छत्रसाल का निर्माण किया और ओहम नरेश को श्री राम महाप्रभु द्वारा तैयार किया गया |
उस समय तक महान हिन्दु सम्राट शिवाजी का स्वर्गवास हो चूका था और सम्भाजी के अंग-अंग काट कर उनकी नृशंस हत्या औरंगजेब के सामने ही कर दी गई थी |
इसके बाद हिन्दुओं के सामूहिक प्रयास द्वारा भारत में चारों और से औरंगजेब के विरुद्ध छापामार युद्ध आरम्भ किया गया | जिसमे की बहुत से धर्म-गुरुओं और साधू-संतों द्वारा समय-समय पर नीतियाँ और परामर्श भी दिए जाते रहे |
यहाँ मैं आपको यह दिलाना चाहूँगा कि औरंगजेब की सेना इतिहास में सबसे बड़ी सेना मानी जाती है धन से भी और व्यक्तियों से भी |
इस तरह औरंगजेब को मारने के छोटे-छोटे प्रयास हमेशा ही किये जाते थे | परन्तु, वो किस्मत का भी धनी था और शायद भारत के गद्दारों के निष्ठा का भी |
एक बार तो मराठा नेता संताजी और धनाजी द्वारा औरंगजेब के तम्बू की सारी रस्सियाँ ही काट कर तम्बू ही गिरा दिया गया था परन्तु , औरंगजेब उस रात अपनी बेटी के तम्बू में था और उसी के साथ सो रहा था | जिस कारण वो तो बच गया पर बाकी सारे के सारे लोग मारे गए |
इस अचानक हमले के बाद संता जी और धनाजी की ख्याति भी बहुत बढ़ चुकी थी और मुस्लिमों में उनका इतना आतंक व्याप्त हो चुका था कि यदि कोई घोड़ा पानी भी नहीं पीता था तो, उसे मुसलमान कहते थे कि क्या तूने संता जी और धना जी को देख लिया है | जो डर के मरे पानी नहीं पी रहा है ?
इसी तरह बुन्देलखण्ड के वीर छत्रसाल ने सौगंध ली हुई थी कि वे औरंगजेब को व्यक्तिगत युद्ध में अपनी तलवार से हराएंगे और छत्रसाल महाराज द्वारा ऐसे कई प्रयास भी किये गए | परन्तु अथक प्रयासों के बावजूद वीर छत्रसाल सफल न हो पाए |
अंतत: प्राण नाथ महाप्रभु जी ने कहा कि औरंगजेब का जिन्दा रहना एक-एक दिन भारी पड़ रहा है हिन्दुओं पर क्योंकि, जब तक औरंगजेब रोज ढाई मन जनेऊ न जला लेता था | तब तक उसे नींद नहीं आती थी |
अब आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि ढाई मन जनेऊ एक दिन में जलाने के लिए कितने हिन्दुओं को मारा और सताया जाता होगा तथा कितने बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन किया जाता होगा | साथ ही, कितनी ही औरतों का शारीरिक मान मर्दन किया जाता होगा एवं कितने ही मन्दिरों तथा प्रतिमाओं का विध्वंस किया जाता होगा ?
प्राण नाथ महाप्रभु जी की यह बातें सुन कर छत्रसाल जी ने अपनी सौगंध वापिस लेकर कहा कि आप जो कहेंगे मैं वो करूँगा | इसीलिए आप दुखी न हों और मुझे आदेश दें |
जिसके बाद प्राणनाथ महाप्रभु जी ने एक ख़ास प्रकार के जहर से युक्त एक खंजर दिया बुन्देलखण्ड को और सारी योजना समझाते हुए कहा कि यह खंजर उस आतताई औरंगजेब को पूरा नहीं मारना है अन्यथा वो तत्काल प्रभाव से मर जायेगा | अतः ये खंजर केवल उसको एक इंच से भी कम गहराई का घाव देते हुए लम्बा सा एक चीरा ही मारना था |
जिससे कि धीरे धीरे उस जहर का असर फैलेगा और वो आतताई औरंगजेब तडप-तडप कर मरेगा |
और, ख़ुशी कि बात है कि बुन्देला वीर छत्रसाल ने इस कार्य को सफलता पूर्वक अंजाम दिया और, जैसा प्राण नाथ महाप्रभु जी ने कहा था ठीक उसी प्रकार उसके शरीर पर एक चीरा दिया | जिससे वो औरंगजेब 3 महीने तक बिस्तर पर रह कर तड़पता रहा और इसी तरह वो तडप तडप कर मरा तथा उसके पापों का का अंत हुआ |
औरंगशाही में औरंगजेब ने स्वयं लिखा है कि ” मुझे प्राण नाथ महाप्रभु और छत्रसाल ने धोखे और छल से मारा है ” |
अतः आप अपने पूर्वजों के इतिहास जो जानें और समझने का प्रयास करें तथा उनके द्वारा स्थापित किये गए सिद्धांतों को जीवित रखें |
जिस सनातन संस्कृति को जीवित रखने के लिए अखंड भारत के सीमाओं की रक्षा हेतु हमारे असंख्य पूर्वजों ने अपने शौर्य और पराक्रम से अनेकों बार अपने प्राणों तक की आहुति दी गयी हो उसे हम किस प्रकार आसानी से भुलाते जा रहे हैं

सीता रावण की पुत्री है

रामकथा के प्रतिनायक रावण में बहुत से श्रेष्ठ गुण होते हुये भी उसका एक आचरण ,उसका एक दोष उसकी सारी अच्छाइयें पर पानी फेर जाता है और उसे सबके रोष और वितृष्णा का पात्र बना देता है ।यदि उस पर पर-नारी में रत रहने और सबसे बढ़कर सीता हरण का दोष न होता तो रावण के चरित्र का स्वरूप ही बदल जाता ।वास्तवकता यह है कि सीता रावण की पुत्री है और सीता स्वयंवर से पहले ही वह इस तथ्य से अवगत था।

'जब मै अज्ञान से अपनी कन्या के ही स्वीकार की इच्छा करूं तब मेरी मृत्यु हो."
-अद्भुत रामायण 8-12 .

देवी भागवत पुराण के अनुसार, जब रावण ने मंदोदरी से विवाह करने की इच्छा को व्यक्त किया तब उसे चेतावनी दी गयी थी कि उसकी पहली संतान का पति रावण को मार देगा । इसके बावजूद, रावण ने मंदोदरी से विवाह किया और जब उसकी पत्नी ने उसके लिये लड़की को जन्म दिया, तब उसने नवजात को पिटारे में छुपा दिया और पिटारे को मिथिला भेज दिया था। और इस तरह जनक को सीता प्राप्त हुयी थी।
वासुदेव हिंदी और उत्तर-पुराण, रामायण का जैन रूपांतरण कहता है कि सीता, रावण और मंदोदरी की संतान है, और जब उनके बारे में भविष्यवाणी हुई कि वह रावण और उनके परिवार के अंत का कारण होगी तब उन्हें छोड़ दिया गया।
रावण की इस स्वीकारोक्ति के अनुसार सीता रावण की पुत्री सिद्ध होती है।अद्धुतरामायण मे ही सीता के आविर्भाव की कथा इस कथन की पुष्टि करती है -
दण्डकारण्य मे गृत्स्मद नामक ब्राह्मण ,लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से, प्रतिदिन एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूँदें डालता था (देवों और असुरों की प्रतिद्वंद्विता शत्रुता में परिणत हो चुकी थी। वे एक दूसरे से आशंकित और भयभीत रहते थे । उत्तरी भारत मे देव-संस्कृति की प्रधानता थी। ऋषि-मुनि असुरों के विनाश हेतु राजाओं को प्रेरित करते थे और य़ज्ञ आदि आयोजनो मे एकत्र होकर अपनी संस्कृति के विरोधियों को शक्तिहीन करने के उपाय खोजते थे।ऋषियों के आयोजनो की भनक उनके प्रतिद्वंद्वियों के कानों मे पडती रहती थी,परिणामस्वरूप पारस्परिक विद्वेष और बढ जाता था)।एक दिन उसकी अनुपस्थिति मे रावण वहाँ पहुँचा और ऋषियों को तेजहत करने के लिये उन्हें घायल कर उनका रक्त उसी कलश मे एकत्र कर लंका ले गया।कलश को उसने मंदोदरी के संरक्षण मे दे दिया-यह कह कर कि यह तीक्ष्ण विष है,सावधानी से रखे।
कुछ समय पश्चात् रावण विहार करने सह्याद्रि पर्वत पर चला गया।रावण की उपेक्षा से खिन्न होकर मन्दोदरी ने मृत्यु के वरण हेतु उस कलश का पदार्थ पी लिया।लक्ष्मी के आधारभूत दूध से मिश्रित होने के कारण उसका प्रभाव पडा।मन्दोदरी मे गर्भ के लक्षण प्रकट होने लगे ।अनिष्ठ की आशंकाओं से भीत मंदोदरी ने,कुरुश्क्षेत्र जाकर उस भ्रूण को धरती मे गाड दिया और सरस्वती नदी मे स्नान कर चली आई।
हिन्दी के प्रथम थिसारस(अरविन्द कुमार और कुसुम कुमार द्वारा रचित) मे भी सीता को रावण की पुत्री के रूप मे मान्यता मिली है ।

भीमटा

भीमटा से दस सवाल :
१. भगवन राम और बुद्ध किस जाति से है ?
२. भगवन बुद्ध को मौत काल (धर्म) की सच्चाई कब पता चला ?
३. आंबेडकर के गुरु पढ़ाई का पैसा और पत्नी किस जाति की थी ?
३. आंबेडकर को नाम किसने दिया ? आंबेडकर मुसलमान क्यों नहीं बने ?
४.आंबेडकर को किसने मारा और इल्जाम किसपर लगाया ?
५.ब्राह्मण विरोध कर पाकिस्तान किसने मुसलमान के साथ मिलकर बनाया ?
६. दलित नेता जोगेंद्रनाथ मंडल पाकिस्तान का प्रथम कानून मंत्री की क्या दुर्दशा हुई और वोट का अधिकार हिन्दू को क्यों नहीं मिला ?
७.जोगेंद्रनाथ मंडल ने इस्तीफा क्यों दिया और सबको मरवाकर भारत क्यों आया ? 
८. तूने जनेऊ संस्कार क्यों नहीं किया ? तुम पूजा क्यों नहीं करते हो ? क्या ब्राह्मण को गाली देने से तुम ज्ञानी बनोगे ? क्या तेरे पूर्वज क्षत्रिय ब्राह्मण नहीं थे | क्या वे वीर पंडित धर्मात्मा नहीं थे क्या उन्होंने राम को नहीं भेजा ? जिसने अंतिम साँस तक मुसलमान नहीं बना | मुसलमान ने अछूत क्यों बनाया ?
९. भगवान् वाल्मीकि बुद्ध महावीर शंकराचार्य विवेकानंद  रामकृष्ण परमहंस तप ज्ञान और वैराग्य से सत्य (श्री हरी विष्णु)  को पाए थे ? तुम इतने तपस्वी हो ?
१०. कबीरदास तुलसीदास रैदास नानकदेव मीरा इत्यादि ने भक्तिमार्ग से सत्य (नारायण श्री राम श्री कृष्णा को पाया ) क्या तुम इतनी भक्ति मार्ग पर चल सकते हो ?

क्या तुमने वेद पुराण की कोई डॉक्ट्रेट डिग्री वेदाचार्य आचार्य प\शास्त्री किया है ? अगर नहीं तो बिना अध्ययन किये तुम गलत सही कैसे कह सकते हो ? अगर तुम्हे वेद  शास्त्र का ज्ञान और उपाधि नहीं है | तो कुतर्क कैसे कर रहे हो ?

आभार

हम बिकेश कुमार आपण गुरुदेव प्रोफेसर डॉक्टर केष्कर ठाकुर गुरु माँ डॉक्टर अरुणा चौधरी के पैर लागेक अइछ हम स्वर्गीय गुरुदेव नरेश मोहन झा आत्मा केर शांति प्राथना और श्रद्धा सुमन अर्पित कअछि.| हम सभ गुरुजन  डॉक्टर प्रमोद कुमार पांडेय, डॉक्टर  शिव प्रसाद यादव ,डॉक्टर राम सेवक सिंह ,डॉक्टर नवनाथ सिंह  एलेक गुरुजन पाय लागि आशीर्वाद माँगत अइछ | हम गणेश जी  सरस्वती माँ  आ जगत जननी माँ सीता (ब्रह्मा विष्णु शिव ) के माता क नमस्कार अइछ | माँ सीता क जन्म माता मंदोदरी आ पिता रावण आ धर्म पिता जनक क नमस्कार अइछ |  भगवान् शिव क नमस्कार अइछ  | भगवान् शिव सती के परित्याग जगत जननी सीता क रूप धरे खातिर कयछ | 
ज शिव (हर) के वश कियैक विष्णु (हरि) आ जे हरि वश कियैक (हरे) मॉ जगत जननी सीता भ गेल आ श्री राम स्वयं नारायण भेल | हम सभका नमस्कार करे छी
कवि विद्यापति क मैथिली साहित्य म प्रथम स्थान  अइछ | हम गोविन्द दास, चन्दा झा, मनबोध, पंडित सीताराम झा, जीवनाथ झा (जीवन झा) क नमस्कार करे छी | 

भारत का मुस्लिमीकरण

इस्लाम का भारत में आगमन और विनाश ( मुहम्मद बिन कासिम )

ईशा शताब्दी में जब अरब और उसके पडोसी देश से असभ्य और बर्बर लोग भारत में आने शुरू हुए थे , उसी समय से लेकर अब तक यह बर्बर गिरोह दीमक और टिड्डी दल के समान इस देश को चट कर गए , भारत के राजप्रशादो में दूध तथा शहद की नदिया बहती थी , नगर हिरे तथा मोतियों से प्रकाशमान थे , उस देश को इन मलेछो ने गन्दी बस्तियों में तब्दील कर दिया। भारत के इस कपट काल को जब स्कूल तथा कालेज में स्वर्ण काल बताते है जब जले पर नमक छिड़कने जैसा प्रतीत होता है , यह कैसा देश जहाँ अपने ही बच्चो को उनके पूर्वजो के साथ हुए अत्याचारो का सही इतिहास नहीं पढ़ाया जा रहा।
जिन शैतानो ने भारत को लुटा , यहाँ की बहन बेटियो की अस्मिता भंग की , भारत माँ की धरती को उनके पुत्रो के खून से ही लाल कर दिया , उसका नाम था ----- मुहम्मद बिन कासिम .
मध्यकाल के भारत का इतिहास पढ़िए , जिसमे यह लालची , अन्धविश्वासी , तथा अरब व इस्लाम का प्रचार करने के बहाने , धरती को रौंदते हुए , खून की नदियां बहाते हुए जब चारो और बिखर रहे थे , यह शायद आप जान ले तो भय से काँप उठेंगे , isis का कोई विडियो देख लीजिये , क्या अमानवीय व्यव्हार होता है उनका , यह आवारा और नैतिकता हीन लोग हर जगह घुसे , इनके एक हाथ में तलवार थी और एक हाथ में मशाल , रात को सोते हुए पर वार करना इनके मजहब का पुराना पेशा था ,चिखती महिलाओ और छोटी बच्चियों से बलात्कार करते थे , यह किसी भी धर्म या जाति का ऐसा स्वरूप है , जो शैतान को भी मात देता है।
हमारा भारत उस समय उन देशो में था जो बुरी तरह झुलसे थे ,कुचले मसले गए थे , . पंगु और अपंग बने थे , आम नागरिक कैदी और बंदी बनाये गए , यह दरिंदे १००० सालो से भारत में आने की कोशिश कर रहे थे , और यह तब तक आते रहे , जब तक इनके अंतिम सुल्तान मुस्लमान शाशक को १८५८ में रंगून की कब्र में सुला ना दिया गया.
अबनिसिया , इराक़ , ईरान , अफगानिस्तान , कजाकिस्तान , उज्बेकिस्तान , के बलपूर्वक बनाये गए मुसलमानो के गिरोह ने डाका और बलात्कार के इस जीवन में अरबो का साथ दिया। ठीक वही हालात आज भारत में फिर से आकर खड़े हो गए है , गद्दारो का शुद्ध प्रतिशत २५ तो है ही है , बाकी हिन्दुओ में है सो है ही।
खैर हरी आँखों वाले उस पशु कासिम हरे झंडे पर आधा चाँद का टुकड़ा लिए भारत आया, सिंधु नदी के दोनों और उसने भारी प्रलय की थी , वह वास्तव में शैतानियत का नंगा नाक्च ही था , लबे प्रयास के बाद ही कासिम भारत में प्रवेश कर पाया था , मुसलमानो ने भारत को लूटने की यौजना ६ठी शतब्दी में ही बनानी शुरू कर दी थी , अनेक शताब्दी तक टिड्डी दल भारत में घुसकर आतंक फैलाते थे , और इसकी उपजाऊ भूमि को चूसते थे , इतिहास ही नहीं , भूगोल के साथ भी इन्होंने बलात्कार ही किया है पुस्ट , दुष्ट , कामी , अनपढ़ , बेकार , अधम और नीच अरब के मुसलमान भारत में आक्रमण कर केवल बलात्कार में ही लीन हो गए , इस्लाम धर्म नहीं बल्कि अंतरष्ट्रीय स्तर पर की गयी लूट की सुसंगठित डकैती थी , यह काम एक शैतान का था , जिसने धर्म का चोला ओढ़ रखा था , हालांकि कई वर्षो तक हिन्दुओ ने इन पशुओ को भारत में प्रवेश से रोक कर रखा इनके सुल्तानों की कब्र बेक टू बेक बनायी , पर यह रुक नहीं पाया
इस्लाम का भारत में प्रवेश का मकसद ही केवल यहाँ की सुन्दर स्त्रियां और धन था , अली खलीफा बना था , उसने भारत पर हमला किया एक हजार से ऊपर हिन्दुओ के सर एक दिन काटे , वापस लौट रहा था , बलात्कार और लूट कर के , सिंध के नजदीक कहीं मारा गया।
अपराधी मुस्लमान भारत की सीमाओ पर झपट्टा मारते रहें , किसी शाशक ने इन पशुओ को उनके घर तक खदेड़ कर नहीं मारा , किसी ने इन पशुओ का अंत नहीं किया , हिन्दुओ की पुरानी आदत है , घर में घुस के नहीं मारते , धर्म कानून उनके आड़े आता है , चाहे कल उनके बच्चो का गला ही क्यू ना यह मल्लेछ काट दे , जैसे आज हम अपने पूर्वजो को दोष है , आने वाली पीढ़ी हमें देगी , की इन पशुओ को मारा क्यू नहीं ??? और हमारी यही कमी घर में घुस के ना मारने की कमी ही है की मुसलमान कश्मीर में हम हिन्दू माँ बहनो की इज़्ज़त लूट पाए , सबसे बड़ी बात
हमारे सामने अब कासिम जैसा शैतान था
कासिम ने ही बलात्कार ओ लूट की नींव भारत में डाली थी , यह वही लोग थे , जिन्हें आज मुर्ख हिन्दू भाई कहते है , कासिम ने विजित हिन्दू भूभाग पर हिन्दुओ पर भांति - भांति के अत्यचार किये , बलपूर्वक लोगो को मूसलमान बनाया , अफगानिस्तान में उसने हिन्दूओ की स्त्रियों और बच्चॊ के सर पर तलवार रख कर कहा , राजा दाहिर के विरुद्ध मेरे लिए युद्ध करो , फिर उन्हें भी बाद में बलपूर्वक मुस्लमान बनाया और जो नहीं बने उनकी बेटियो बहनो , पत्नियों के साथ बलात्कार किया , उन्हें इराक़ की मंडी में लेजाकर बेच दिया।
राजा दाहिर सिंध के राजा , ( सिंध जो अब पाकिस्तान में है ) के दुर्ग में प्रवेश के बाद इस्लाम की मशीन चली , नागरिको पर अत्याचार किये गए , आम लोगो को सताया गया , बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया। जो मुसलामन नहीं बने , उन्हें जिन्दा जलाया गया , सर काटे गए माँ के सामने बेटो के , इसकी प्रमाणिकता के लिए हाल ही में मुसलमानो का यजिदियो पर किया गया अत्याचार है , प्रतीक्षा करो १० - १५ साल में तुम्हारे साथ भी यही होने की सम्भावना है , और इसी तह सेक्यूलर बने रहे , तो ढाई तीन साल में आपकी मुराद पूरी हो जायेगी इंशाअल्लाह।
कासिम ने वहां कई शिवालय को तोडा , एक बहुत बड़ा शिव का मंदिर था , हिन्दू तीर्थ स्थल था , उसे धवस्त किया , हिन्दुओ को मुसलमान बनाये , फिर वही किया जो अफगानिस्तान में किया , बच्चो के सर पर तलवार रख के हिन्दुओ से ही हिन्दुओ को कटवाया , कहा जाता है की यहाँ से जाते वक़्त वो बहुत ही सुन्दर १ लाख हिन्दू युवतियों को लेकर गया था , जिसे बगदाद के बाजारों में बेचा गया था।
कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई , हिन्दुओ का गौरव बाकी है , आखिर यु ही नहीं आज भी सिंध में हिन्दू रुके हुए ,
यूनान मिस्र रोम मिट गए सब जहाँ से
कुछ बात है की हस्ती , मिटती नहीं हमारी
राजा दाहिर के मंत्री ने कहा की क्यू ना संधि कर ली जाए , दाहिर दहाड़ उठे , कैसी संधि की बात करते हो मंत्री , इस प्रजा की सारी कन्याएं जो मेरे लिए बेटी सामान है , जिनकी रक्षा करना एक पिता होने के नाते मेरा धर्म है , क्रोधित राजा दाहिर ने मंत्री को सलाह के इनाम के तोर पर उसका सर धड़ से अलग कर के दिया।
जंगली चीतों के बीच , मदमस्त हांथी की तरह लड़ते राजा दाहिर , जिनके शशरीर के हर अंग से खून बह रहा था , फिर भी वो अंतिम समय तक लड़े , अपनी आने वाली पीढियो के लिए लड़े , और युद्ध भूमि में ही इस शूरमा ने स्वर्ग की प्राप्ति कर ली।
पर कासिम अपनी किस्मत लिख चूका था , उसने दो ब्राह्मण कन्या को कैद कर लिया उम्र होंगी उनकी कोई १६ साल के करीब , बुद्धि और बल दोनों से जिस अवस्था में कासिम था उसी अवस्था में उसे घसीट कर युद्ध से दूर ले गयी , और ताजा भेंसे की खाल में सिल दिया , घुट घुट कर वो शैतान उन देवीयो के चरणों में दर्दनाक मौत मरा।
उन दोनों ब्राह्मण कन्याओं के भोग की चाहत परवर्ती खलीफा को भी थी , किन्तु वह हिम्मत नहीं जूटा सका , जिन्होंने भी उन कन्याओ के करीब आने की भी कोशिश की , उन्होंने उसे ही मौत के घाट उतार दिया , बाद में सुलेमान ने उनके देह का भोग करने का मोह त्याग करके उन्हें घोड़े की पूंछ पर बाँध के दमिश्क़ की सड़को पर घसीटा , उन कमनीय शरीर के चीथड़े चीथड़े हो गए , .
किन्तु बस तभी से भारत का मुस्लिमीकरण शुरू हो गया , आज तक जारी है ,

SANT RAVIDAS : Hari in everything, everything in Hari

For him who knows Hari and the sense of self, no other testimony is needed: the knower is absorbed. हरि सब में व्याप्त है, सब हरि में...

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चेतावनी : मै किसी धर्म, पार्टी, सम्प्रदाय का विरोध या सहयोग करने नही आया हूँ | मै सिर्फ १५,००० बर्ष की सच्ची इतिहास अध्ययन के बाद रखता हूँ | हिन्दू एक ही पूर्वज के संतान है | भविस्य पुराण के अनुसार राजा भोज ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए कार्य का बंटवारा किया था | जिसके अनुसार कोई भी अपने योगयता के अनुसार कार्य कर सकता था | कोई भी कोई कार्य चुन सकता था | पूजा करना , सैनिक बनना,खाना बनाना,व्यापार करना ,पशु पालना, खेती करना इत्यादि | ये कालांतर में जाति का रूप लेता गया | हिन्दू के बहुजन समाज (पिछड़ा, अति पिछड़ा, अन्य पिछड़ा, दलित और महादलित ) को सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष कर रहा हूँ | योगयता और मेहनत ही उन्नति का साधन है | एक कटु सत्य : यह हैं की मध्य काल में जब वेद विद्या का लोप होने लगा था, उस काल में ब्राह्मण व्यक्ति अपने गुणों से नहीं अपितु अपने जन्म से समझा जाने लगा था, उस काल में जब शुद्र को नीचा समझा जाने लगा था, उस काल में जब नारी को नरक का द्वार समझा जाने लगा था, उस काल में मनु स्मृति में भी वेद विरोधी और जातिवाद का पोषण करने वाले श्लोकों को मिला दिया गया था,उस काल में वाल्मीकि रामायण में भी अशुद्ध पाठ को मिला दिया गया था जिसका नाम उत्तर कांड हैं। जो धर्म सृष्टि के आरम्भ के पहले और प्रलय के बाद भी रहे उसे सनातन धर्म कहते है | सनातन धर्म का आदि और अंत नही है | नया सवेरा